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पन कि जो किसीसे न जीता जाय ऐसोरतिवधन राजेन्द्र जयवन्तहोवे राजा कश्यपने धनीके श्रावनेकाप्रति घराण' उत्सव किया और सब सेना के सामन्तों को कहाय भेजा कि स्वामी तो विद्यमान तिष्ठे है और तुम 1880
स्वामोद्रोही के साथ होय स्वामीसे लड़ोगे क्या यह तुमको उचित है तबवह सकल सामंत सर्बगुप्तको छोड स्वामीप पाए और युद्ध में सर्वगुप्त को जीवता पकड़ काकंदीनगरीकाराज्य रतिवर्धनके हाथ में आया राजाजीवतावचा सो फिर जन्मोत्सव किया महादान किए सामंतों के सनमान किए भगवान्की विशेष । पूजा करी कश्यप का बहुत सन्मान किया अति बधाया और घरको विदा किया सो कश्यप काशी के विषे लोकपालों की नाई रमें और सर्बगुप्त सर्वलोकनिन्द मृतक के तुल्य भया कोई भीटे नहीं मुख देखे नहीं, तब सर्वगुप्त ने अपनी स्त्री विजयावली का दोषसर्वत्र प्रकाशा कि इसने राजाबीच और मोबीच तफावत पाया यह बृतांत सुन विजियावली प्रति खेद को प्राप्त भई कि मैंने राजा की भई न धनी की भई सो मिथ्ण तप कर राक्षसी भई, और राजा रतिवर्धन ने भोगों से उदासहोय सुभानुस्वामी के निकट मुनिव्रत धरे सो राक्षसी ने रतिवर्धन मुनिको अति उपसर्ग किए मुनि शुभोपयोग के प्रसाद से केवली भए, और प्रियंकर हितंकर दोनों कुमार पहिले इसी नगर विषे वसुदेव नामा विप्र श्यामली स्त्री के वसुदेव की स्त्री विश्वा और सुदेव की स्त्री प्रियंगु इनका गृहस्थ पद प्रशंसा योग्य था इन श्री तिलक नाम मुनि को आहार दान दिया सो दान के प्रभाव कर दोनों भाई स्त्री सहित
उत्तरकुरु भोगभूमि में उपजै तीनपल्यका प्रायुभया, लाघुका जो दान सोई भया वृक्ष उसके महाफल भोग | भूमि में भोग दूजे स्वर्ग देवभए वहां सुख भोग चये सो सम्यग्ज्ञान रूपलक्ष्मी कर मंडित पाप कर्म के चय।
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