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________________ 26 Jaina Literature and Philnsophy [663 Begins - fol. 10 ए० ॥ सकलगणिशिरोमणि ॥ श्री ५ श्रीऋद्धिविमलगणि २गुरुभ्यो नमः ॥ राग गोडी ॥ ऋषभ अजित संभव जिनो ॥ अभिनंदन सुमतीशो॥ पदमप्रभ सुपाओ अरह जिनो || चंद्रप्रभ सुविधीसो॥१॥ तूटक ॥ वंदिह सीतल जिन सिअंसो वासुपूज्य जिणंद रे॥ नमो विमल अनंत धम्मों सांतिनाथ मुणिंद रे॥ कुंथु अर जिन मल्लि ॥ सुव्रत नमो श्रीनमि नेभि रे ।। पास जिनवर वीर जगगुरु ॥ विविध धुरि समोभि रे ॥ २ ॥ etc. -fol. 2a समरीय मनि उल्हास वासुपूज्य जिनवर तणो ॥ भणत्युं पुण्यप्रकाश ॥८॥ Ends-fol. 34b श्रीमदानंदविमलेंदु गुरुवंदीइं ॥ पाटि तस श्रीविजयदानसूरो॥ तास पंटि प्रसनो कृपलो वंदिई ।। हरिविजय सुगुणपूरो ॥१॥ श्रीमसकलमुनि सुकयरो ॥ सकल संयमधरी ॥ दिनकरो श्री'तपा' गच्छ केरो ॥ हीरविजय गुरुराजथी। प्रा(भा )ज जगि कोपि अधिको न दीसह अनेरो । २ श्री। श्रीवासुपुज्यपुण्यप्रकाशो वसु श्रवण हृदयांबुजे जाव सूरो ॥ सकलमुनि चिंतिओ श्रीसंघसंतिओ ॥ निर्मलो सुरभिजिम जगि कपूरो ॥३॥ श्री. नगरी 'बावती' जेणे बहु धनवती॥ जयति जिहां थंभणो पासनाहो सतत धरणेद्र पद्मावती पूजितो ॥ सकलसिरि संखमुख विजलींहो ।। ४ ।। इति श्रीवासुपूज्यजिनप्रकाश संपूर्ण ॥ संवत् सत्तर अधिक उत्तर सतावन (१७५७ )तांमे कंझो। मास माधव असित पक्षे छठिं गुरुवारे लह्यो। नगर पा 'पाटण' धर्ममांडण अंबादत्ते लिख्यो वली॥ ए रास ग्गओ जिना ध्याओ पाप सवि जाये बली ॥१॥" For additional works see Vol. XIX (ii) 2 pp. 233-34. 1. This versa is composed by scribe. Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.018043
Book TitleDescriptive Catalogue of Govt Collections of Manuscripts Part 3 Svetambara Works
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal R Kapadia
PublisherBhandarkar Oriental Research Institute
Publication Year1987
Total Pages332
LanguageEnglish, Sanskrit
ClassificationCatalogue & Catalogue
File Size11 MB
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