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Jaina Literature and Philosophy
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'षरतर 'गननायक परो । जंगम जुगपरधान । श्रीजिनसिंघसूरीसरू । नमीय इ सगुणनिधान ॥५॥ विनयवंत विद्यानिलो । गणि हीरनंदन गाइ ।
गुरु सुपसायइ गाइसुं । रंगह हरचंदाइ ॥ ६ ॥ etc. Ends-fol.50b
गच्छराज जिनसिंघसूरि गुरु । श्रीहेममंदरसीस।...... जसवंतगणि कहइ जयवंता हो । विद्यागुरु सुजगीस ॥ ६ गुण. भावसुं जेह भणइ गुणइ । सांभलइ जे सुषकंद। सिवसुष तेहनइ संपजइ । इम बोल दूहो जैन मुगट भाणंद ॥ ७ गुण. इति श्रीसत्तसाहसविषये राजाश्रीहरचंदचोपई समाप्ता ॥ संपूर्णा ।। दूहो॥ नाम ठाम गुरुदेव अरु । अभ्यर जे लोपंति । ते नर जनमि जनमि लगइ 'कुंभी' नरगि पडंति ॥ सर्वगाथा ८०८॥ सइछइ ॥ प्रक्षेपश्लोक ८१ छह ॥ सर्वढाल ३८ छइ ॥ ग्रंथाग्रंथ सर्वश्लोका १२५१ छह ॥ सुभं भवतुः कल्याणमस्तुः लेषकपाठकयोः ॥ सं(व)त १७१७ वर्षे भाद्रपदमासे कृष्णपक्षे एकादशीतिथौ मंगलवासरे श्री 'भागरा 'नगरमध्ये लिपीकृतं प्रतिरीयं ॥ विद्वज्जनाभिः सम्यक्तया वाचनीय । प्रवर्तनीयं च । संसोधनीयं प्रत्तिरिति ॥ ॥ दूहो ॥ कृपावंत हिव कृपा करि॥ वाचेज्यो सुविचार। जिम प्ररयास ए माहरो । सफलो हुइ संसार ॥१॥ संपूर्ण ॥
Reference - It seems that this work is not noted in Jaina Gurjara
Kavio.
Hariscandrarāsa
हरिश्चन्द्ररास No. 885
393 1871-72
Size --- 10g in. by 4g in. Extent -- 38 folios; 15 lines to a page ; 45 letters to a line.
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