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Jaina Literature and Philosophy
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Begins -fol. 14 ॥ ॐ॥
श्रीगुरुभ्यो नमः ॥ दूहा ।। विहरमाण जिण वंदीयइ ॥ धुरि सीमंधरस्वामि ॥ सपरिवार सहुनइ नमुं। अतिसय जे अभिराम ।। श्रीआदीस्वर आदि दे। चउवीसइ जिणराय । गणधर श्रमण सती सइ ।। श्रुतदेवी बहूभाय ॥ २ ॥ etc. भवियण सुणज्यो भाव धरि ॥ हरिवाहनगुणवृंद ॥
समगति सीलसु नारिनर ॥ पामीजइ आणंद ।। ११ ॥ etc. Ends - fol.15a
साधु तणा गुण गाई यइ संपति लहियइ सार करमचंद गुर सुषकरू नइ दामोदर पार बहुप्पार हरष अपार दामोदर तणई आग्रहि करी संवत सतर तिजेतरइ( १७०३ १ )ए चरित्र रचियो चित धरी 'उजेणि 'पुरि आनंद सेती संघ सहुमनिभाई यह सुष संपदा मुनझांझ पांमई साधु तणा गुण गाई यइ ४
इति श्रीहरिवाहनचउपई समकतिसीलविषये ऋषि श्री श्री झांझणजी. कृतिरियं पूज्यश्री श्री जी तत्प्रसादात् पूज्य श्री श्री श्री जी तत्प्रसादात् पूज्य श्री श्री जी तत्प्रसादात् तसिष्य ऋषि लिषतं आतमार्थ संवत् १७६५ वरषे कार्तिकवदि १४ दिने कतकवार शनिवारे लिषतं 'थनेसर'मध्ये श्रीरस्तु
लेषकपाठकयो भद्रं भवतु कल्याणमस्तु सर्वदा श्री श्री श्री।। श्री ॥ छ । श्री Reference - It seems that this very MS. is noted in Jaina Gurjara
Kavio (Vol. II, p. 466). Neither extracts are given nor additional MSS. mentioned.
हरिश्चन्द्रकथानक
Hariscandrakathānaka
1334 No. 882
1884-87 Size - 104 in. by 4 in. Extent -17 folios ; 13 line to a page; 35 letters to a line. Description - Country paper somewhat thick, tough and white; Jaina
Devanagari characters with पृष्ठमात्राs; big, quite legible and tolerably good hand-writing; borders ruled in tw
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