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Jaina Literature and Philosophy
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समरीय सामणि सारदा ए सानदिसंभारो भागि पाल्यो प्रति एहनुं ए कहो सुषकह्मारो १ तो उठी ततक्षिण भणे एडं आविसु अंगि सेठ सुंदरसण तणो रास रचियो मनरंगि
'जंबू'दीवि 'भरह ' etc. Ends - fol. 50
'तप 'गच्छगुरु गोइमसमो ए मा (5) श्रीमुषसुंदरसूरि
नामिहिसिर्व संधि संपजै ए मा० दूरीय पणासए दूरि ४८ सु. तासु तणो सेवकि रच्यो ए मा० राम(स) रूडो हृदयरंगि थाप्यो सील सोहांमणो ए मा० आणंद उपजि अंगि ४९ संवत पनर एकोतरे (१५७१ ) ए मा. जेठहिचोथहि सुध पुष्प निक्षित्र गुरु वारसू ए मा० चारित्र पोहवि प्रसिध सु. ५७ जां लगि 'मेरु' महीधरु ए मा० जा लगि सायर पूर सालसूदरसण गाइयो ए मा० जा लगि ससिने सूर ५१ जे नर सील हे निरमला ए मा नारि वाहिया मूल बे कर जोडीय कवि कहेयमा हुँ तेहना पगनी धूलि ५२ सु० सा लहि सिवसुष संपजिए मा० सील लगि नव निधि सालि सुर सा निधि करि ए मा० सयलि सहु प्रसिद्ध ५३ सीलि उछव नित करि ए मा० सा(सी)लहि कोडि क(ड)ल्याण सीयल लगि कहीय किसूं ए मा० पामीय पांचमी ठाण ५४ सु. सील प्रबंध जे सांभले ए मा० नर नि नारीय वृंद धन सुदरसण रिष केवली ए मा० चतुर्विध संघ सुप्रस्तनां ५५
सुण सुदरी चतुर्विधसंघ प्रसन इति सुदरसणसेठरास समाप्त Reference - For additional details see No. 841. N. B. — For other details see No. 843.
Sudarsanākathā (Sudarisaņākabā)
सुदर्शनाकथा (सुदरिसणाकहा)
No. 843 Size -9g in. by 43 in.
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1895-98
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