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________________ 174 Jaina Literature and Philosophy [782 जगनायक चउवीस जिण प्रणमुं तेहना पाय । नामनी रसुं झीलतां पापमइल सहु जाय १ चवदइ सइ बावन्न (१४५२) तसु गणधर सहु गुणधाम ध्यान धरतां जेहनउ थाय इ वंछित काम २ After six verses we have :केवलिवचन जिके कह्यां ते सहु वात तहत्त श्रेणिक नृप ज्युं सलहियें समकित शुद्ध सहित्त ९ सुणज्यो श्रेण(णि)कनी कथा धिरज्युं समकित थाय १० ॥ etc. सषरी ढाले संयुगत मिश्री दू(दूध मिलाय ॥ Ends --- fol. 34b श्रेणिकचरितमें विस्तर संबंध । सुणतां श्रवण सुहावें । मु दय विलोवणे लीजियै भाषण गोरस मन ललचावै री। गुणवंततिके गुण गावें ॥३॥ सतरइसे उगणीसमैं( १७१९) वरसें । 'चंदेरी 'पुरि चावै । श्रीजिनभद्रसूरिश्वरशाषा । विधि परतर 'वडदावै री। गु० ४ । सुभकरणी जिनचंद यतीश्वर गणधर गोत्र गजा वै । राजै 'सूरित 'सहर चौमासैं । वलि जस पडह वजावै री || गु० ५। पाठक साधुकीरति साधुसुंदर विमलकीरति वरतावै । विमलचंदस(रा?)मविजय हरषजस ॥ श्रीभ्रमशील प्रभावै री ।।गु० ६ ॥ वय लघुमै उगणी समै० वरसें । कीधी जोडि कहावै । भायौ सरस वचनको इणमै । सो सदगुरु सुपसावै री ॥७॥ गु०॥ श्रोता वकता श्रीसंघ सहुना । विधनपरा मिटि जावै । इहभव परभव सहु सुखसाता। पांमै धरमप्रभावै री। गुण० ८ ॥ इति श्रीशुद्धसम्यत्तोपरि श्रीश्रेणिक महाराजस्य चतुःपदिका सर्वढाल ३२ संपूर्णा ।। श्रेयोस्तुतराम् सर्वगाथा ७३१ ।। श्री 'वीकानेर'मध्ये उपाध्याय श्री श्री धर्मवर्द्धनगणि तत् शिष्य वाचनाचार्य श्री श्री कीर्तिसुंदरगणी तत् शिष्य शांतिसोमजी मुनि ॥ पं० सभाचंदमुनिलिषिता ॥ श्री ।। श्री॥ Reference - For extracts and additional MSS. see Jaina Gurjara Kavio. Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.018043
Book TitleDescriptive Catalogue of Govt Collections of Manuscripts Part 3 Svetambara Works
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal R Kapadia
PublisherBhandarkar Oriental Research Institute
Publication Year1987
Total Pages332
LanguageEnglish, Sanskrit
ClassificationCatalogue & Catalogue
File Size11 MB
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