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________________ ग्रंथांक ........प्रा. ..२११ थी +-२६६ ....... जिनमद्रसूरि कागळनो हस्तलिखित ग्रंथ भंडार - जैसलमेर दुर्ग ग्रंथर्नु नाम | स्थिति कर्ता भाषा संवत् । पत्र संख्या । झेरोक्षसी .डी. ग्रंथान विशेष नोंध २०८....... सूक्ष्मार्थविचारसारप्रकरण-सार्धशतकप्रकरण टिप्पणीसह पंचपाठ, ........... मध्यम .. जिनवल्लभगणि .......... प्रा. .............. .. २०५ थी २१०... २६६/ २०९....... सूक्ष्मार्थविचारसारप्रकरणटिप्पनक...... मध्यम ........ २४... २०५ थी २१०... २६६/....१४५७ २१०....... ...पंचलिंगीप्रकरण विवरणसहित...... जिनेश्वरसूरि -मू.. ........ .......... १५३५ ................. १८... २०५ थी २१० ...२६६....१४०० सर्वराजगणि वाचनाचार्य -वि. सामाचारी.. जीर्णप्राया काव्यकल्पलता कविशिक्षावृत्तिसह ...... मध्यम .. अमरचंद्रसूरि . ........... १५१६ ५२.. २११ थी २१४ ...२६६ काव्यकल्पलता..... मध्यम ... अमरचंद्रसूरि .. २११ थी २१४ ...२६६ बाग्भटालंकार ............ मध्यम .. वाग्भट .................. ........... १५४८ साधुवंदनारास अपूर्ण जीर्णप्राया सूत्रकृतांगसूत्रावचूरि अपूर्ण ... जीर्ण मुरारिनाटक टिप्पणीसह .. मध्यम ... मुरारि कवि ............ ......... १५५४ षडावश्यकबालावबोध अपूर्ण. २१८ थी २२२ अमरुशतक टिप्पणीसह.. जीर्णप्राया अमरुक कवि ........... .सं.............. १५४२ .....२८० प्रयोगविवेकसंग्रह ... मध्यम .. वररुचि ....... ........... १५४४ ............. ............ व्याकरणविषयक औक्तिक जेवो ग्रंथ बलाबलसूत्र मध्यम.......... बलाबलसूत्रवृत्ति टिप्पणीसह .......... जीर्ण ....... अष्टप्रकारपूजाकथा (विजयचंद्रकेवलिचरित्रांतर्गत) ...... मध्यम ... चंद्रप्रभ महत्तर .......... दशवैकालिकसूत्र ........ मध्यम .. शय्यंभवसूरि ............ २२५...... सिद्धान्तविचारसंग्रह (सिद्धांतगत आलापक) मध्यम ....... ............... २२६ .... अंतकृद्दशांगसूत्रवृत्ति .... मध्यम .. अभयदेवसूरि ............ .................६ ...३३७ २२७/१ ....... ज्ञाताधर्मकांगसूत्रवृत्ति ... श्रेष्ठ..... | अभयदेवसूरि ....... र.११२०-ले.१५५६ ...............१-७४ .... २२७ ....४२५५ २२७/२ उपासकदशांगसूत्रवृत्ति श्रेष्ठ .... अभयदेवसूरि ७४-८७ २२८...... त्रिषष्टिशलाकापुरुषचरित्र महाकाव्य दशमपर्व-महावीरचरित्र... मध्यम ... हेमचंद्रसूरि सं............. १५३६ -.............. ........२२८ ...२६८/....५५८५ जीर्ण... ... २२३ Jain Education International For Private &Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.018010
Book TitleJesalmer ke Prachin Jain Granthbhandaron ki Suchi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJambuvijay
PublisherMotilal Banarasidas
Publication Year2000
Total Pages665
LanguageHindi
ClassificationCatalogue & Catalogue
File Size14 MB
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