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पाइय-सह-महण्णवो में अनुपलब्ध वसुदेवहिण्डी की शब्दावली (२)
के. आर. चन्द्र इसी सम्बन्ध में एक सूची ‘सम्बोधि', जिल्द ६, अंक, ३-४ में छप चुकी है और प्रस्तुत शब्दावली वसुदेवहिण्डो के आगे के ७७ से २०० पृष्ठों का समावेश करती है अर्थात् ग्रन्थ के प्रथम खंड के प्रथम अंश की ही यह शब्दावली है । [संकेत ०=पिशल के प्राकृत-व्याकरण में अनुपलब्ध, *=सम्बोधि(जिल्द ६, अंक ३-४) में प्रथम लेख में प्रकाशित शब्दों का विशेष स्पष्टीकरण; पासम. पाइय-सद्द-महण्णवो; मोविसंडि. मोनियर-विलियम्स संस्कृत-इंगलिश डिक्शनरी]
० अइणे (१०८.११) अति-नी लाना अइवाहिय (१५५.१७) अतिवाहिक-चौकीदार अंतरवत्ति (११४.१८) अन्तरवर्तिन्=अन्दर रहने वाला, गर्भ में रहने वाला अकल्ल (१८९.२) अकल्य-अस्वस्थ अकोस (१६२.४) अकोश-कोशरहित, अनावृत, विकसित अक्कुट (११८.१) आक्रुष्ट-कुपित अक्खित्त (८३.१८) आक्षिप्त-अपहृत अगल्लिग (९२.६) अकल्यिक-अस्वस्थ अग्गाणीय (८१.१८) अग्रानीक=अग्रदल, सैन्यमुख ० अच्छिय (१६८. २८) आच्छिद्-थोड़ा काटना, चारों ओर काटना
अच्छेरिय (१२८.३) आश्चर्य अणुयत्तयं (१७५.९) अनुयात्रकम् भ्रमण के लिए
अणुपय, अणुवय (१२६.१६,१२२.१८) अनुपत्=पीछे पड़ना *अप्पणिय (३०.३) आत्मनीय अप्परिपडिय (१११.१६) अप्रतिपतित-अनष्ट, सतत स्थिर अब्भुससत्त' (१३७.२३) अभ्युच्छवसत्-ऊँचा साँस लेता हुआ, स्पंदित होता हुआ अम्मगा, अम्मया (१३६.३, १३७.२) माता, स्त्री अयाणुग (७९.२७) अज्ञायक-अज्ञ, अज्ञानी, अनजान अलच्छीअ (१४४.१६) अलक्ष्मीक-अभागा अवकरेऊण (१९७.२) अवकीय (अवकृ) बिखेरना, ऊपर डालना अथवा स्वागत,
__ आभार या अनुग्रह प्रकट करना • अवकिरिय (१५१.२७) अवकीर्य दूर करके, त्याग कर अवछूढ (१३७.११) अवक्षिप्त नीचे फेंका हुआ अवज्झ (१६९९) अप+उज्झू-त्याग करना १. अब्भूससन्त अथवा अब्भुच्छसन्त यह पाठ होना संभव है ।
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