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________________ Homage to Vaisali संघ मुझसे क्या चाहता है ? आनन्द ! तथागत को जो उपदेश करना था, कर दिया / अब धर्म का कोई रहस्य शेष नहीं है। मैं अब वृद्ध हो चला हूँ। मेरी उम्र अस्सी वर्ष की है। जिस तरह पुरानी गाड़ी बाप-बूंध कर चलती है ऐसे ही आनन्द ! तथागत का शरीर भी बांधबूंध कर चल रहा है / इसलिये आनन्द ! आत्म प्रदीप बनो और अपनी शरण जाओ।" वहाँ से विहार करते हुए भगवान चापाल चैत्य आये। आकर बिछे आसन पर बैठे / आनन्द भी भगवान् का अभिवादन कर बगल में बैठ गये। बैठने के थोड़ी देर बाद आनन्द से तथागत ने कहा-"आनन्द ! जिन्होंने चार ऋद्धियां योगसिद्धियाँ साधे हैं, वे चाहें तो कल्प भर ठहर सकते हैं या कल्प से बचे काल तक !" इस प्रकार तीन बार संकेत करने पर जब आनन्द नहीं समझ सके, तब भगवान ने कहा-"आनन्द ! जिसको काल समझते हो".." इस पर आनन्द भगवान का अभिवादन कर वहां से थोड़ी दूर जाकर एक पेड़ के नीचे बैठ गये / आनन्द के चले जाने के थोड़ी देर बाद दुष्ट मार वहाँ आया, आकर एक ओर खड़ा होकर भगवान् से प्रार्थना करने लगा। मन्ते ! यह भगवान के परिनिर्वाण का समय है / भन्ते ! भगवान् यह स्वीकार कर चुके हैं कि जबतक हमारे श्रावक धर्मघर, बहुश्रुत और पूर्णज्ञानी नहीं हो जाते तबतक मैं परिनिर्वाण प्राप्त नहीं करूंगा / मन्ते ! अब आपके श्रावक इस योग्यता को प्राप्त कर चुके हैं। आपने असंख्य मनुष्यों का उद्धार कर दिया है। भगवान् को उपदेश देते बहुत दिन हो गये। यह निर्वाण का समय है / अब शीघ्र निर्वाण लाभ करें। इस प्रकार मार के तीन बार आग्रह करने पर भगवान् ने बालू के कुछ कण अपने नाखून पर रख कर, मार से पूछा-"मार! मेरे नख पर के कण पृथ्वी पर के कणों के बराबर हैं या नहीं ?" इस पर मार ने कहा, नख पर के कण से पृथ्वी भर के धूलि-कणों की संख्या कहीं अधिक है। इस पर भगवान ने कहा जिन लोगों की रक्षा की गयी है उनकी संख्या नख पर के कण के बराबर है, और जो बाकी हैं, उनकी संख्या पृथ्वी भर के धूमि-कणों के समान असंख्य है / तो भी मार आज से तीन मास बाद मैं निर्वाण प्राप्त करूंगा। ऐसा कह कर भगवान् ने स्मृति संप्रजन्य के साथ अपना आयु संस्कार छोड़ दिया। - इसी समय ध्यानावस्थित आनन्द को एक स्वप्न दिखाई पड़ा कि एक बड़ा भारी वृक्ष, विसकी गलें मोर पत्तियां बहुत दूर तक फैली हुई हैं, और खूब सघन छाया कर रही है, अकस्मात् एक भयंकर भूचाल आया और वह वृक्ष ऐखा उखड़ गया कि उस स्थान पर उसका कोई चिह्न भी शेष नहीं रहा। आनन्द का, इस स्पण से, हृल्य अत्यन्त भयभीत हो उठा / मानन्द वहां से भगवान् के समक्ष भाये और इसका कारण पूछा। भगवान् ने इस स्वप्न के आठ कारण बताये जिसमें एक यह भी, जब किसी महापुरुष का महानिर्वाण होने वाला रहता है, तब ऐसा स्वप्न दिखाई पड़ता है। वानन्द ने भगवान् का निर्वाण-काल समीप जान कर उनसे कुछ दिन और ठहरने के लिए प्रार्थना की। किन्तु भगवान् ने कहा-"वानन्द ! इसमें तुम्हारा ही अपराध है क्योंकि तीन बार संकेत करने पर भी मार के प्रभाव में आने के कारण तुम नहीं समझ सके। इसलिए अब आग्रह का समय नहीं रहा। आनन्द ! तुमसे मैंने पहले ही कह दिया है कि सभी प्रिय बस्तुषों से वियोग अवश्यम्भाषी है। संसार में जो भी
SR No.012088
Book TitleVaishali Abhinandan Granth
Original Sutra AuthorN/A
AuthorYogendra Mishra
PublisherResearch Institute of Prakrit Jainology and Ahimsa
Publication Year1985
Total Pages592
LanguageHindi, English
ClassificationSmruti_Granth
File Size17 MB
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