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सागरमल जैन
हैं । वैशाली के स्तूप को मुनिसुव्रत का स्तूप कहा गया है । यद्यपि मथुरा के स्तूप को शिलालेख में वोदव-स्तूप कहा गया है, कहीं वह बौद्ध तो न हो ? दूसरे उसके पास से उपलब्ध पाद-पीठ पर अर्हत् नन्द्याव्रत का उल्लेख है', किन्तु प्रो० के० डी० बाजपेयी ने उसे मुनिसुव्रत पढ़ा है, कहीं ऐसा तो नहीं हो कि आवश्यकचूर्णीकार ने भ्रमवश उसे वैशाली में स्थित कह दिया हो।
पुरातत्त्व की दृष्टि से मथुरा में न केवल जैन स्तूप के अवशेष उपलब्ध हुए हैं, अपितु अनेक आयागपटों पर भी स्तूपों का अंकन और स्तूप-पूजा के दृश्य उपलब्ध होते हैं। एक शिलाखण्ड में तो आसपास जिन-प्रतिमाओं और बीच में स्तूप का अंकन है। एक अन्य आयागपट पर किम्पुरुषों को स्तूप की पूजा करते हुए दिखाया गया है । मथुरा से उपलब्ध स्तूप-अंकन से युक्त अनेक आयागपटों पर शिलालेख भी हैं । इस सबसे इतना स्पष्ट हो जाता है कि इस काल में जैनों में स्तूप-निर्माण और स्तूप-पूजा की परम्परा रही है। स्तूप के आसपास जिन-प्रतिमा से युक्त शिलाखण्ड इसका सबसे महत्त्वपूर्ण प्रमाण है, किन्तु मथुरा में जो भी स्तूप और स्तूपों के अंकन सहित आयागपट मिले हैं, वे सभी ईसा पूर्वसे लेकर ईसा की तीसरी शताब्दी तक के ही हैं । ईसा की चौथी-पाँचवीं शताब्दी के बाद से न तो स्तूप मिलते हैं और न स्तूपों के अंकन से युक्त आयागपट ही। इस सम्बन्ध में Jain Art and Architecture, Chapter 6th and 10 th. विशेष रूप से द्रष्टव्य हैं । इन पुरातात्त्विक प्रमाणों से भी मेरी इस मान्यता की पुष्टि होती है कि ईसा की तीसरी और चौथी शताब्दी के बाद जैनों में स्तूप-पूजा की प्रणाली लुप्त होने लगी थी।
व्यवहारचूणि और व्यवहारसूत्र की मलयगिरि टीका में मथुरा के देवनिर्मित स्तूप के निर्माण की कथा एवं उसके स्वामित्व को लेकर जैनों और बौद्धों के विवाद की स्पष्ट सूचना
An inscription (Lüders, List No. 47 ) dated 79 (A.D. 157) or 49 (A.D. 127), on the Pedestal of a missing image mentions the installation of an image of Arhat Nandiāvarta at the so-called Vodva stūpa built by the gods ( devanirmita).
-Jaina Art and Architecture, A. Ghosh, vol. I. P. 53. Sri Mahavira commemoration, vol. I. Agra, P. 189-190. ६. मथुरायां नगर्यां कोऽपि क्षपक आतापयति, यस्यातापनां दृष्टवा देवता आदृता तमागत्य वन्दित्वा ब्रूते,
यन्मया कर्तव्यं तन्ममाज्ञापयेद्भवानिति । एवमुक्त सा क्षपकेण भण्यते, किं मम कार्यमसंयत्या भविष्यति, ततस्तस्या देवताया अप्री तिकमभत । अप्रीतिवत्या च तयोक्तमवश्यं तव मया कार्य भविष्यति, ततो देवताया सर्वरत्नमयः स्तूपो निर्मितः, तत्र भिक्षवो रक्तपटा उपस्थिताः अयमस्मदीयः स्तूपः, तैः समं सङ्गस्य षण्मासान् विवादो जातः, ततः सङ्गो ब्रूते-को नामात्रार्थे शक्तः, केनापि कथितं यथामुकः क्षपकः, ततः सङ्केन स भण्यते-क्षपक ! कायोत्सर्गेण देवतामाकम्पय, ततः क्षपकस्य कायोत्सर्गकरणं देवताया आकम्पनम् सा आगता ब्रूते-संदिशत किं करोमि, क्षपकेण भणिता तथा कुरुत यथा सञ्जस्य जयो भवति, ततो देवताया क्षपकस्य हिंसना कृता, यथा एतन्मया असंयत्या अपि कार्य जातं एवं खिसित्वा सा ब्रूते-यूय राज्ञ. समीपं गत्वा ब्रूत, यदि रक्तपटानां स्तूप ततः कल्ये रक्ता पताका दृश्यतां, अथास्माकं तर्हि शुक्ला पताका, राज्ञा प्रतिपन्नमेवं भवतु, ततो राज्ञा प्रत्ययिकपुरुषः स्तूपो रक्षापितः रात्रौ देवताया शुक्ला पताका कृता, प्रभाते दृष्टा स्तूपे शुक्ला पताका, जितं सर्छन ।
-व्यवहारचूणि, मलयगिरिटीका-पञ्चम उद्देशक, पृ० ८ ।
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