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लक्ष्मीचन्द्र जैन
( paradox ) उपस्थित होता है। साधारणतः किसी भी समय किसी भी वस्तु की स्थिति एक ही स्थान पर होनी चाहिये । किन्तु सूक्ष्म जगत् का नियम ही कुछ और है। गतिशील होते ही वह एक ही समय में अनेक प्रदेश में स्थित ऋजु रेखा पार कर सकती है। प्रश्न है कि क्या वक्र रेखा पर नहीं ? यहाँ स्थिति का अर्थ position है, life time नहीं। इस तथ्य का सूक्ष्म अध्ययन आज के विज्ञान की अनिश्चितता सम्बन्धी क्वांटम यान्त्रिकी के सिद्धान्त में नया मोड़ ला सकता है। यह देखना होगा कि प्रकृति में सबसे सूक्ष्म काल का अन्तराल क्या है। यह भी देखना होगा कि इस अन्तराल में सबसे सूक्ष्म हटाव कितना होता है और अधिकतम कितना । अभी तक ज्ञात सबसे सूक्ष्म अन्तराल (१०)-१४ सेंटीमीटर है, अथवा (१०)१४ सेन्टीमीटर है। प्रकाश की गति एक सेकेन्ड में ३४ (१०) सेन्टीमीटर है, जो इस दूरी को (१०)-२४ अथवा /(१०)२४ सेकेन्ड में तय करती है। . विश्वप्रहेलिका में मुनि महेन्द्रकुमार (द्वितीय) ने १ प्राण का मान ४४४६३५५६ आवलिकाएं प्राप्त किया है, जो ३८९३ सेकेन्ड के लगभग होना चाहिये । एक आवलि में जघन्ययुक्त असंख्यात समय होते हैं, जिसको संख्या की गणना की जा सकती है। उसे दाशमिक रूप में लाकर आज के ज्ञात सूक्ष्मतम कालान्तराल से तुलना की जा सकती है। उसी पर आधारित पल्यकाल के समयों की संख्या है, जिसका सम्बन्ध सूच्यंगुल के प्रदेश संख्या माप से निम्नलिखित हैसूच्यंगुल प्रदेश संख्या = पल्य के समयों की संख्या में उसी संख्या का पल्य के अर्धच्छेद बार
गुणन से प्राप्त संख्या हो सकता है कि मंदतम गति की अवधारणा ध्रुवीकरण जैसी घटनाओं पर गहराई तक प्रकाश दे सके।
अब कुछ त्रिलोकसार विषयक विवरण पर आयें । खगोल विद्या से सम्बन्धित लोक की सीमाएँ, उसमें ज्यामितीय खण्ड, चारों ओर से वेष्टित पदार्थ, कुछ भूगोल, कुछ ज्योतिकीविज्ञान तथा अन्य तथ्य हैं। इस ग्रन्थ में कुछ नवीन तथ्य अवश्य हैं, यथा ऋतु, राहु, मध्यप्रदेश, धारा विवरण आदि। हम सर्वप्रथम इस बात को समझने का प्रयत्न करें कि इन तथ्यों को प्रकाशित करने में जैन मत का प्रयोजन ( अभिप्राय ) क्या था? लोक का आकार 'पुरुष', जो सर्व प्राणियों में सर्वाधिक विकसित अवस्था है-सिद्ध का भी अन्ततः आकार वही है। कमर पर हाथ रखे हुए पुरुष को चारों ओर घुमा देने पर शंक्वाकार छिन्नक पिण्डों वाला लोक दृष्टिगत होता है, जो आधार और शीर्ष आदि के नापानुसार ठीक ३४३ घन राजू नहीं होता है। वीरसेनाचार्य ने उसे स्फान ( wedge ) के आकार में सिद्ध कर उसे ठीक ३४३ घन राजू सिद्ध किया और नि परम्परा को बदल दिया ।' आधार प्रमाण लोक और द्रव्य लोक की सिद्धि थी। प्रमाण या जीवों की संख्या वाली पट्टियाँ बतलाते हुए इन ग्रन्थों में दशा का विवरण भी चलता रहा, और अन्ततः न केवल ज्योतिष वरन् भौगोलिक वर्णन भी उसमें प्रमाण रूप से तथा विवरण रूप से स्थान पा गये। एक बात तो यह है कि इस बात का ध्यान नहीं रखा गया कि किस प्रकार का अंगुल अथवा योजन वहाँ उपयोग में आ रहा है। आत्मांगुल, प्रमाणांगुल और उत्सेधांगुल, तीनों के लिए केवल अंगुल प्रतीक बनता चला गया। छायामाप से भौगोलिक गणनाएँ होती थीं, गगनखण्डों में ग्रहों की स्थिति, अथवा तारादिगणों की जम्बूद्वीप सम्बन्धी गणनाएँ भी होती थीं और इन दोनों को मिला देने पर १. षड्खण्डागम, पुस्तक-४, १९४२, पृ० ११ आदि देखिये आकृतियाँ १, २,३ ।
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