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मधुसूदन ढांकी भी बताया गया है ।' प्रमाणशास्त्र पर उनके द्वारा किसी ग्रन्थ-लेखन की भी यहाँ सूचना है। अजितयशा की यह रचना आज हमारे सामने नहीं है ।
प्रभावकचरितकार ने अजितयशा से सम्बन्धित उपर्युक्त सूचना कहाँ से प्राप्त की, यह विचारणीय है। सं० १२९१ ( ईस्वी १२३५ ) को एक अप्रकाशित ताड़पत्रीय हस्तप्रति में अन्य श्वेताम्बर महापुरुषों के चरित्र महापुरुषों के चरित्र के साथ मल्लवादि सूरि का चरित भी सम्मिलित है।' क्या यह स्रोतों में से एक होगा ? प्रभावकचरित से लगभग १३५ वर्ष पूर्व लिखी गई बृहद्गच्छीय आम्रदत्त सुरि की आख्यानकमणिकोश-वृत्ति में भी अजितयशा के सम्बन्ध में ठीक यही बात कही गई है। इस कृति में अजितयशा द्वारा किसो ग्रन्थ की रचना से कुछ वर्ष पूर्व की एक कृति-- भद्रेश्वर सूरि की कहावलि-में अन्य बातों के साथ वादि अजितयशा द्वारा ग्रन्थ-लेखन का उल्लेख है। ऐसा लगता है कि कहावलि का "मल्लवादि चरित" ही प्रभाचन्द्राचार्य के "मल्लवादि-चरित्र" में पल्लवित हुआ है । कहावलिकार ने मल्ल और तीसरे बन्धु यक्ष ( जिसने भी मुनि बन कर सूरिपद प्राप्त किया ) के साथ ही अजितयशा को भी “परवादि-वारण-मृगेन्द्र" कहा है, जो उनके न्याय-विषयक और दार्शनिक ज्ञान तथा खड्ग सदृश्य तीक्ष्ण बुद्धि का परिचायक है। शोध द्वारा अजितयशा के अन्य अवतरण उनके नाम से अथवा बिना नाम के, मिल जाना असम्भव नहीं।
हारिल वाचक और उनका ग्रन्थ थारापद्र-गच्छ के वादिवेताल शान्ति सूरि ने, अणहिल्लपत्तन में लिखी गई, स्वकृत उत्तराध्ययनसूत्र-वृत्ति ( प्राकृतः ईस्वी १०४० पूर्व ) में हारिल वाचक के वैराग्यप्रबोधक, दो पद्य उनके नाम सहित उद्धृत किये हैं । यथाः १. सं० जिनविजय मुनि, सिंधी जैन ग्रन्थमाला, अहमदाबाद कलकत्ता १९४०, पृ० ७७ । २. Ed. C. D. Dalal, A Descriptive catalogue of Manuscripts in the Jain
Bhandars of Pattan, Gaekwad's oriental Series No. LXXVI, Baroda 1937,
pp. 194-195. ३. सं० मुनि पुण्यविजय, प्राकृत ग्रन्थ परिषद्, वाराणसी १९६२, पृ० १७२-१७३ । ४. "नवरं विरइओ अजियजस्सो वायगो निओ पमाणगंथो वि, अजियजस्सो वाइ नाम पसिद्धो।"
Cf. Lalchandra B. Gandhi, "Introdution", Dvādaśaranaya Cakra of Sri Mallavadisuri, Pt. 1 ( Ed. Late muni Caturvijayji), Gaekwad's oriental Series, No. CXVI, Baroda 1252, p. 10; एवं सं० मुनि जम्बुविजय, "प्राक्कथनम्" द्वादशारं नयचक्रम्, प्रथमो विभाग ( १-४ अराः ), जैन आत्मानन्द सभा, भावनगर १९६७, पृ० १२), प्रभावकचरित में संस्कृत रूप में यही बात इस तरह मिलती है।" ..........."सन्ति ज्येष्ठोऽजितयशाभिधः १०॥"
तथाऽजितयशोनामः प्रमाणग्रन्थमाहर्य । ३४।" ( वही, पृ० ७७-७८ )। ५. दोनों ग्रन्थों के पाठों की तुलना से यह स्पष्ट है। ६. भोगीलाल ज० सांडेसरा, जैन आगम साहित्यमां गुजरात [ गुजराती ], संशोधन ग्रन्थमाला-ग्रन्थांक ८,
गुजरात विधानसभा, अहमदाबाद, पृ० २१७; तथा मोहनलाल मेहता, जैन साहित्य का बृहद् इतिहास भाग ३, वाराणसी १९६७, पृ० ३९२ ।
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