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१. नरक गति
बौद्धधर्म में नरकों की संख्या आठ है - १. सञ्जीव, २. कालसुत्त, ३. संघात, ४. जालरोसव, ५. धूमरोसव, ६. तापन, ७. प्रतापन एवं ८. अवीचि । यह पृथ्वी २,४०,००० योजन गम्भीर है । इसमें १,२०,००० योजन पर्यन्त मृत्तिकामय तथा १,२०,००० योजन पर्यन्त पाषाणमय है । नीचे-नीचे एक निरय से दूसरे निरय के बीच १५,००० योजन का अन्तर है। इन चार महानरकों के आसपास ४ प्राकार और ४ द्वार हैं । उनके समानान्तर ४ उपनिरय हैं - गूथनिरय, कुक्कुलनिरय, सिम्बलिवन और असिपत्रवन । इनके चारों ओर खारोदका नदी है । क्षुधा, तृष्णा आदि का वर्णन जैनधर्मं से मिलता-जुलता है ।
जैनधर्म में बौद्धधर्म की अपेक्षा नरकों का वर्णन अधिक गंभीर और विस्तृत मिलता है । इसके अनुसार सात नरक हैं । इन भूमियों में दुगंन्ध, शीत, उष्ण, क्षुधा, पिपासा आदि रहती हैं। भयंकर दुःख यहाँ जीव प्राप्त करता है। इसका संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार है'
नाम
१
१. रत्नप्रभा
खरभाग
पंकभाग
अब्बहुल
२. शर्करा
अपर
नाम
२
धर्मा
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भागचंद जैन भास्कर
वंशा
मेघा
३. बालुका
४. पंकप्रभा
अंजना
५. धूमप्रभा
अरिष्टा
६. तमप्रभा
मघवी
७. महातमप्रभा माघवी
मोटाई इन्द्रक
३
योजन
१८०००० १३ ४४२०
१६०००
८४०००
४ श्रेणीबद्ध
५
८००००
३२००० ११ २६८४
२८००० ९ १४७६
२४००० ७
२०००० ५ २६०
१६०००
६०
८०३० १
३
७००
४
४९ ९६०४
बिलों का प्रमाण प्रकीर्णक
६
२९९५५६७
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२४७९३०५
१४९८५१५
९९९२९३
२९९७३५
९९९३२
X
८३९०३४७
कुल बिल
३० लाख
२५ लाख
१५ लाख
१० लाख
३ लाख
९९९९५
१. तिलोय पण्णत्ति २.२६ २७ राजवार्तिक, ३.२.२; त्रिलोकसार, १५१; जंबूदीवपण्णत्ति, ११, १४३१४४; जैनेन्द्र सिद्धांत कोश, भाग २, पृ० ५७७ ।
८४ लाख
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