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सागरमल जैन, मधुसूदन ढाको वस्तुतः पालि साहित्य में वर्णित उदकरामपुत्त हो है--अन्य कोई नहीं। उदकरामपुत्त की साधनापद्धति ध्यान-प्रधान और मध्यममार्गी थी, ऐसा भी पालि साहित्य से सिद्ध होता है।' सूत्रकृताङ्ग में भी उन्हें आहार करते हुए मुक्ति प्राप्त करने वाला बताकर इसी बात की पुष्टि की गई है २ कि वह कठोर तप साधना का समर्थक न होकर मध्यममार्ग का समर्थक था। यही कारण था कि बुद्ध का उसके प्रति झुकाव था । पुनः सूत्रकृताङ्ग में इन्हें पूर्वमहापुरुष कहा गया है। यदि सूत्रकृताङ्ग के रामगुप्त की पहचान समुद्रगुप्त के पुत्र रामगुप्त से करते हैं तो सूत्रकृताङ्ग की तिथि कितनी भी आगे ले जायी जाय, किन्तु किसी भी स्थिति में वह उसमें पूर्वकालिक ऋषि के रूप में उल्लिखित नहीं हो सकता। साथ ही साथ यदि सूत्रकृताङ्ग का रामगुप्त समुद्रगुप्त का पुत्र रामगुप्त है तो उसने सिद्धि प्राप्ति की, ऐसा कहना भी जैन दृष्टि से उपयुक्त नहीं होगा, क्योंकि ईसा की दूसरी-तीसरी शताब्दी तक जैनों में यह स्पष्ट धारणा बन चुकी थी कि जम्बू के बाद कोई भी सिद्धि को प्राप्त नहीं कर सका है, जबकि मूल गाथा में 'सिद्धा' विशेषण स्पष्ट है।
पुनः रामगुप्त का उल्लेख बाहुक के पूर्व और नमि के बाद है, इससे भी लगता है कि रामगुप्त का अस्तित्व इन दोनों के काल के मध्य ही होना चाहिए। बाहुक का उल्लेख इसिभासियाइं में है और इसिभासियाइं किसी भी स्थिति में ईसा पूर्व की ही रचना सिद्ध होता है। अतः सूत्रकृताङ्ग में उल्लिखित रामगुप्त समुद्रगुप्त का पुत्र नहीं हो सकता। पालि साहित्य में भी हमें 'बाहिय' या 'बाहिक' का उल्लेख उपलब्ध होता है, जिसने बुद्ध से चार स्मृति-प्रस्थानों का उपदेश प्राप्त कर उनकी साधना के द्वारा अर्हत् पद को प्राप्त किया था। पालि त्रिपिटक से यह भी सिद्ध होता है कि बाहिय या बाहिक पूर्व में स्वतन्त्र रूप से साधना करता था। बाद में उसने बुद्ध से दीक्षा ग्रहण कर अर्हत्-पद प्राप्त किया था। चूंकि बाहिक बुद्ध का समकालीन था, अतः बाहिक से थोड़े पूर्ववर्ती रामपुत्त थे । पुनः रामगुत्त, बाहुक, देवल, द्वैपायन, पाराशर आदि जैन परम्परा के ऋषि नहीं रहे हैं, यद्यपि नमि के वैराग्य-प्रसङ्ग का उल्लेख उत्तराध्ययन में है । इसिभासियाइं में जिनके विचारों का सङ्कलन हुआ है, उनमें पार्श्व आदि के एक दो अपवादों को छोड़कर शेष सभी ऋषि निग्रंन्थ परम्परा ( जैन धर्म ) से सम्बन्धित नहीं हैं। इसिभासियाई और सूत्रकृताङ्ग दोनों से ही रामगुत्त ( रामपुत्त) का अजैन होना ही सिद्ध होता है, न कि जैन । जबकि समुद्रगुप्त का ज्येष्ठपुत्र रामगुप्त स्पष्ट रूप से एक जैन धर्मावलम्बी नरेश है।
सम्भवतः डा० भागचन्द्र अपने पक्ष की सिद्धि इस आधार पर करना चाहें कि सूत्रकृताङ्ग को मूल गाथाओं में "पुत्त" शब्द न होकर "गुत्त" शब्द है और सूत्रकृताङ्ग के टीकाकार शीलाङ्क ने भी उसे रामगुप्त ही कहा है, रामपुत्त नहीं, साथ ही उसे राजर्षि भी कहा गया है, अतः उसे राजा होना चाहिए। किन्तु हमारी दृष्टि से ये तर्क बहत सबल नहीं हैं। प्रथम तो यह कि राजर्षि विशेषण नमि एवं रामगुप्त ( रामपुत्त) दोनों के सम्बन्ध में लागू हो सकता है और यह भी सम्भव है कि नमि के समान रामपुत्त भी कोई राजा रहा हो, जिसने बाद में श्रमण दीक्षा अङ्गीकार कर ली ।
पुनः हम यदि चूणि की ओर जाते हैं, जो शीलाङ्क के विवरण की पूर्ववर्ती हैं, उसमें स्पष्ट रूप से 'रामाउत्ते' ऐसा पाठ है, न कि 'रामगुत्ते' । इस आधार पर भी रामपुत्त ( रामपुत्र ) की अवधारणा
१. मज्झिम निकाय, २।४।५; २।५।१०। २. सूत्रकृताङ्ग, १।३।४।२ ।
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