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________________ २१६ श्री पुष्करमुनि अभिनन्दन ग्रन्थ 1 44 + ++++ + .. . . ..... .... ...... .. ........ ... रहता है। यह जीव अशरण है। प्राणियों पर बार-बार जन्म-मरण की मार पड़ती है। इससे बचने का एक मात्र सहारा शुभकर्म है । हर प्राणी कर्मों के कारण ही सुख-दुःख भोगता है। इसलिए शुभकर्मों का संचय करो। (दृष्टव्य-जैन कथाएं भाग १२, पृ. १६२) केवली भगवान् ने अनंत पुण्यों के उदय से प्राप्त होने वाले मानव शरीर की महत्ता को बताते हुए कहा'यदि जीव अपने पूर्वभव को जान लेता है तो वर्तमान जन्म के सुख-दुखों को देखकर पूर्वभव के शुभ-अशुभ कर्मों से अवगत हो जाता है और फिर उसका प्रयत्न शुभ कमों की ओर उन्मुख होता है और तभी वह धर्म की महत्ता को समझता है। कर्म का यह शाश्वत नियम है यादृशं क्रियते कर्म तादृशं भुज्यते फलम् । यादशमप्यते बीजं प्राप्यते तारशं फलम् ।। अर्थात् जैसा कर्म किया जाता है, वैसा ही उसका फल मिलता है; जैसा बीज बोया जाता है वैसे ही फल की प्राप्ति होती है। (दृष्टव्य-आदर्श दम्पति, जैन कथाएं भाग १० पृष्ठ १७५-७६) जैन कथाओं में नारी : नारी की जीवन-गाथा बड़ी विचित्र है। कभी इसने अपनी वीरता से संसार को नतमस्तक बनाया, कभी अपने पुरुषार्थ से असंभव को सम्भव किया, कभी नर से आगे बढ़कर इसी नारी से शास्त्रार्थ आदि के माध्यम से अपने अगाध पाण्डित्य को मुखरित किया तो कभी वह विषय-वासना की पुतली बनी एवं सर्वत्र ठुकराई गई। युगों के परिवर्तनों के साथ नारी की कई समस्याएं जुड़ी हुई हैं। कभी धार्मिक युग में पूजित होकर भी वह कामिनी के रूप में त्याग-साधना का विकार बनीं । नरक के द्वार-रूप में तिरस्कृत हुई तो कभी माता के रूप में बह पूजी गई । सन्त काव्य में नारी की निन्दा जी खोलकर हुई। रीतिकाल में वह रति के समान काम्या बनी, और भोग्या के रूप में कामातुरों के लिए प्रेयसी कहलाई। कभी वह बाजारों में बिकी तो कभी उसकी रमणीयता उसी के लिए अभिशाप बन गई । यद्यपि तीर्थकरों की माताएं प्रणम्य हैं, आराध्या हैं आदर्शवाद की प्रतीक है फिर भी सामान्य नारी के लिए कथाकारों ने कई ऐसे प्रसंग उपस्थित किये, जो उसकी गरिमा के लिए उपयुक्त नहीं कहे जा सकते हैं । यह सब कुछ होते हुए भी नारी ने जिस धैर्य से अपने शील को सुरक्षित रखा है, वह चिरस्मरणीय है, चिरवन्दनीय है तथा युग-युगों तक काल जयी होने के कारण अमर रहेगा। भगवती ब्राह्मी, वैराग्यमूर्ति सुन्दरी, धैर्य की देवी दमयंती, महासती सीता, महासती राजीमती, महासती प्रभावती, मृगावती, चन्दनबाला, महासती सुभद्रा, अंजना, मदनरेखा, चेलणा, शीलवती, महासती शिवा आदि क्या कभी भुलाई जा सकेंगी? कभी नहीं । श्रमण-संस्कृति के साथ ही वे अजर और अमर हैं । किसी ने इस नारी को विश्वासघात का नाम दिया है तो किसी ने उसके मन को शीतकाल की वायु के समान अस्थिर बताया है। किसी पीड़ित ने यदि नारी को बाचालता में देखा है तो कभी नीतिकार ने कामिनी की कसौटी कनक माना है जैन साहित्य में नारी-विषयक विविध धारणाएँ हैं । कबीर ने झुझलाकर एक बार कहा था कि : सांप बीछि को मंत्र है माहुर झारे जात । विकट नारि पाले पड़ी काढ़ि करेजा खात ॥ लेकिन क्या संत कबीर को अपनी जननी की कभी याद आई थी कि नहीं ? गोस्वामी तुलसीदास ने स्त्री जाति की निंदा यों की है : काम क्रोध लोभादि मद प्रबल मोह के धारि । तिन्ह मई अति दारुन दुखद माया रूपी नारी ।। १ Frailty ! the name is Woman. २ A woman's mind and Winter wind charge oft. ३ A woman's strength his in her tongue. * The proof of woman is gold of man a woman. Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.012012
Book TitlePushkarmuni Abhinandan Granth
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDevendramuni, A D Batra, Shreechand Surana
PublisherRajasthankesari Adhyatmayogi Upadhyay Shree Pushkar Muni Abhinandan Granth Prakashan Samiti
Publication Year1969
Total Pages1188
LanguageHindi, English
ClassificationSmruti_Granth & Articles
File Size39 MB
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