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________________ सोमसेनभट्टारकाविरचितकृष्णो वर्णश्च वै घे घे इति पल्लव उच्यते । पुत्रजीवकृता माला विज्ञेया विविधैर्गुणैः ९६ ॥ निषेधक मंत्रके जपते समय ईशान दिशा, संध्या समय, भद्रपीठासन, वज-मुद्रा, काला वर्ण, पुत्रजीव (?) मणिकी माला और अन्तमें घे घे यह पल्लव होता है ॥ ९५-९६ ॥ विद्वेषकर्मणि प्रायो मध्याह्नः काल इष्यते । अग्निदिक्चापि धूम्राभो वर्णो हमिति पल्लवः ॥९७॥ . प्रवालाख्या मता मुद्रा कुर्कुटासनमुत्तमम् । पुत्रजीवकृता माला जपने तत्र शस्यते ॥ ९८ ।। विद्वेष-कर्म मंत्रके जपते समय मध्यान्ह काल, आग्नेय दिशा, धूम्र वर्ण, प्रवाल-मुद्रा, कुर्कुटामन, पुत्रजीव मणिकी माला और अन्तमें “हूँ" यह पल्लव होता है ॥ ९७-९८॥ उच्चाटकर्मणि प्रोक्तमासनं कुर्कुटाभिधम् । . वायव्यदिक् चापराह्नः कालो मुद्रा प्रवालजाः ॥ ९९ ॥ , धूम्रवर्णो मतो वर्णो फडित्येव हि पल्लवः । उच्चाटनकर्म मंत्रकी सिद्धि करते समय कुर्कुटासन,वायव्य दिशा, अपराह्न (दोपहर बादका) काल, प्रवाल-मुद्रा, धूम्रवर्ण, और अन्तमें “ फट् ” यह पल्लव माना गया है ॥ ९९ ॥ शान्तिकर्मणि विज्ञेयं पङ्कजासनमुत्तमम् ॥ १० ॥ समयश्वार्धरात्रश्च वारुणी दिक्प्रशस्यते । ज्ञानमुद्रा मौक्तिकानां माला स्वाहेति पल्लवः ।। १०१॥ चन्द्रकान्तसमो वर्णः श्वेतवासोऽपि पुष्पकम् । शान्तिकर्म मंत्रको सिद्ध करते समय कमल-आसन, अर्धरात्रि काल, पश्चिम दिशा, ज्ञानमुद्रा, मोतियोंकी माला, चाँद जैसा रंग, श्वेतवस्त्र, श्वेत ही पुष्प ओर अन्तमें “ स्वाहा" यह पल्लव उत्तम माना है ॥ १००-१०१ ॥ पौष्टिके कर्मणि प्रातः कालो नैर्ऋत्यदिङ्मता ॥ १०२॥ ।। पङ्कजासनमेतद्धि ज्ञानमुद्रा विधानतः । स्वधेति पल्लवो वर्णश्चन्द्रकान्तसमो मतः ॥ १०३ ॥ मौक्तिकी नाममालेति पुष्पं श्वेतं च चीवरम् । द्वादशाङ्गुलपर्वाणि दक्षिणावर्ततो जपेत् ॥ १०४ ।।
SR No.010851
Book TitleTraivarnikachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPannalal Soni
PublisherJain Sahitya Prakashak Samiti
Publication Year
Total Pages438
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size16 MB
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