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________________ त्रैवर्णिकाचार। rwwwwwwwwwwwwwwwwwantwanAN एक संवत्सर हो तो एक मातासे उत्पन्न दो पुत्रोंका अथवा दो पुत्रियोंका अथवा पुत्र और पुत्रीका छह महीने पहले पहले विवाह न करे। हां, यदि वर्ष-भेद हो तो छह महीने पहले . पहले कर सकते हैं । इसी तरह पुत्र अथवा पुत्रोके विवाह के छह महीने पहले एक संवत्सरमें चौलकर्म 'भी न करे। वर्ष-भेद हो तो कोई हानि नहीं है । अपरके श्लोकोंमें पुनरुक्तताका विचार नहीं करना चाहिए क्योंकि ये श्लोक भिन्न भिन्न ऋषियोंके बनाये हुए हैं, यहांपर- उनको संग्रह किया गया है। अतः पुनरुक्तताका आना स्वाभाविक बात है ॥ १९३. ॥ . एकमात्ममूतानां पुत्रीणां परिवेदने । . दोप: स्यात्सर्ववणेपु न दोपो भिन्नमातृषु ॥ १९४ ॥ एक मातासे उत्पन्न पुत्रियों के परिवेदनका सभी वर्गों में दोष माना गया है । परन्तु भिन्नभिन्न माताओंसे उत्पन्न पुत्रियों के परिवेदनमें कोई दोष नहीं है। भावार्थ-बड़ी पुत्रीके विवाहके पहले छोटी पुत्रीका विवाह करनेको परिवेदन कहते हैं। एक मातासे उत्पन्न हुई दो पुत्रियोंमेंसे छोटी पुत्रीका विवाह पहले करना और बड़ी पुत्रीका वादमें करना दोष है । परन्तु भिन्न-भिन्न माताओंसे उत्पन्न हुई दो पुत्रीयोंमेंसे छोटी पुत्रीका विवाह पहले कर दिया जाय और बड़ी पुत्रीका यादमें करे तो कोई दोष नहीं है ॥ १९४ ॥ कन्याका रजोदोप। . असंस्कृता तु या कन्या रजसा चेत्परिप्लुता ।., . . . भ्रातरः पितरस्तस्याः पतिता नरकालये ॥ १९५ ॥ विवाह न होने के पहले यदि कन्या रजस्वला हो जाय तो उसके भाई और माता-पिता नरक को जाते हैं । भावार्थ-बारह वर्षसे ऊपर कन्याओंका रजोधर्मका समय है अतः उनका विवाह बारह वर्ष तक कर देना चाहिए । यद्यपि कोई कोई कन्याएं बारह वर्षसे ऊपर मी रजस्वला होती है, परंतु तो भी कितनी ही कन्याएं बारह वर्षमें भी हो जाती हैं अतः इस अवधिके भीतर ही विवाह कर देना चाहिए, क्योंकि विवाह पहले रजस्वला होनेमें उक्त दोष माना गया है ।। १९५ ॥ ... पितुर्गृह तु या कन्या रजः पश्येदसंस्कृता। . . . सा कन्या कृपली ज्ञेया तत्पतिषलीपतिः॥ १९६॥ जो कोई कन्या अपने विवाहसे पहले पहले रजोधर्मसे युक्त हो जाय तो उसको शूद्रा या रजस्वला समझना चाहिएं और उसके पतिको भी शूद्राका पति या रजस्वलाका पति समझना, चाहिए ॥ १९६ ॥ अमजा दशमे वर्षे स्त्रीपजां द्वादशे त्यजेत् । : 'मृतमजां पञ्चदशे सद्यस्त्वमियवादिनीम् ॥ १९७ ॥. प्रथम ऋतुमतीके समयसे लेकर दशवे वर्षतक जिस स्त्रीके सन्तति न हो तो उसके होते हुए दूसरा विवाह करे । तथा जिसके केवल कन्याएं ही होती हों-पुत्र न होते हों तो बारहवें वर्ष बाद उसके होते हुए दूसरा विवाह करे । तथा जिसके संतति तो होती हो पर जीती न हो तो पंद्रह वर्ष बाद दूसरा विवाह करे । और अपुत्रवती अप्रियवादिनीके होते हुए तत्काल दूसरा विवाह करे । भप्रियवादिनीका अर्थ व्यभिचारिणी.भी है ॥ १९७. ॥ .. .. ।
SR No.010851
Book TitleTraivarnikachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPannalal Soni
PublisherJain Sahitya Prakashak Samiti
Publication Year
Total Pages438
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size16 MB
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