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________________ २१६ सोमसेनमहारकाविरचित तेजस्वी शान्तरूपश्च त्यागी भोगी दयापरः । . . बलिष्ठश्च रणे योद्धा प्रोक्तो राजा स पण्डितः ॥६६॥ राजा तेजस्वी, शान्त, उदार, सम्पत्तिका उपभोग करनेवाला, दयालु, बलवान, योद्धा और विद्वान होना चाहिए ॥६६॥ .. .. तिम्रो मंत्रप्रभूत्साहशक्तयश्च प्रकीर्तिताः। वामनोदैवसिद्धयन्ता नृपे तिस्रश्च सिद्धयः ।। ६७ ॥ मंत्र-शक्ति, प्रभु-शक्ति और उत्साह-शक्ति-ये तीन शक्तियां हैं। वचन-सिद्धि, मन-सिद्धि और देव-सिद्धि-ये तीन सिद्धियां हैं ॥ ६७ ॥ पागुण्यं नृपतौ प्रोक्तं राज्यरक्षणहेतवे । सन्धिविग्रहयानासनाश्रयद्वैधभावनम् ॥ ६८ ॥ '. राज्यकी रक्षाके लिए राजामें सन्धि, विग्रह, मान, आसन, आश्रय और वैधी भाव-ये छह गुण कहे गए हैं ॥ ६८॥ समतादर्शनं स्वस्य ददेदानमार प्रति । भेदः शत्रोश्च सेनाया दण्डः शत्रुनिपातनम् ॥ ६९ ॥ समता-सबको समान देखना, दान-अपने शत्रुको नजराना देना, भेद-शत्रुकी सेनामें फूट मचा देना, और दण्ड-शत्रुका विनाश करना-ये चार राज्यकी रक्षाके उपाय हैं ॥ ६९॥ . सहायाः साधनोपायो देशकालवलावले । विपत्तेश्च प्रतीकारः पञ्चधा मन्त्र इष्यते ॥ ७० ॥ अपने सहायक कौन कौन हैं, अपने पास क्या क्या साधन हैं, इस समय कौनस उपाय करना चाहिए, देश-काल अपने अनुकूल है या प्रतिकूल है, तथा इस आई हुई आपत्तिक प्रतीकार कैसे हो सकता है--इस तरहके विचार करनेको पांच प्रकारके मंत्र कहते हैं ॥७० अष्टादशाक्षौहिणीनां स्वामी मुकुटबन्धकः। क्षोणीलक्ष्म ततो वक्ष्ये जिनागमानुसारतः ॥ ७१ ॥ जो अठारह अक्षौहिणी सेनाका स्वामी हो उसे मुकुटबद्ध राजा कहते हैं । अक्षौहिणी सेनाका लक्षण जिनागमके अनुसार आगे कहते हैं ॥ ७१ ॥ . . पत्तिः सेना च सेनास्यं गुल्मो वाहिनिपृतने । चमूरनीकिनी चेति चाष्टधा शृणु तद्विधिम् ॥ ७२ ॥ पत्ति, सेना, सेनामुख, गुल्म, वाहिनी, पृतना, चमू और अनीकिनी ये सेनाके आठ भेद हैं। . इनके लक्षण आगे कहते हैं ॥७२॥
SR No.010851
Book TitleTraivarnikachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPannalal Soni
PublisherJain Sahitya Prakashak Samiti
Publication Year
Total Pages438
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size16 MB
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