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________________ १६८ सोमसेनभद्वारकविरचित www चैत्यालयप्रवेशमंत्र। ॐ ही अहं निःसही निःसही रत्नत्रयपुरस्सराय विद्यामण्डलनिवेशनाय समयाय निःसही जिनालयं प्रविशामि स्वाहा । जिनालय प्रवेशः। इसे पढ़कर जिनालयमें प्रवेश करे । गंधोदकसेंचनमंत्र। ॐ ही पवित्रं गन्धोदकं शिरसि परिपेचयामि स्वाहा । गन्धोदकपरिषेचनम् । इस मंत्रको पढ़कर शिरपर गन्धोदक छिड़के। नमस्कारविधि। उर्ध्वाधो वस्त्रयुक्तः सन् स भूमौ श्रीजिनाधिपम् ।। नमेत्साष्टांगविधिना पञ्चांगविधिनाऽथवा ॥ ६२ ॥ धोती-दुपट्टेसे युक्त वह श्रावक, जमीनपर, श्री जिनदेवको साष्टांग अथवा पंचांग नमस्कार करे ॥ ६२॥ पश्वर्द्धशय्यया यद्वा प्रणामः क्रियते बुधैः । भक्त्या युक्त्या स्थलं दृष्ट्वा यथावकाशकं भवेत् ॥ ६३ ॥ अथवा पश्वर्ध शय्यासे, भक्तिपूर्वक योग्य रीतिसे वह बुद्धिमान जिनदेवको प्रणाम करे । सो जैसा अवकाश हो वैसा स्थान देखकर नमस्कार करे ॥६३॥ - अष्टांग नमस्कार ।। हस्तौ पादौ शिरश्चोरः कपोलयुगलं तथा । अष्टांगानि नमस्कारे प्रोक्तानि श्रीजिनागमे ॥ ६४ ॥ दोनों हाथ, दोनों पैर, शिर, छाती, और दोनों कपोल ये आठ अंग नमस्कार करनेमें, जिनागममें कहे गये है। अर्थात् इन आठ अंगोंसे नमस्कार करे । भावार्थ-इन आठ अंगोंको जमीनपर टेक कर नमस्कार करनेको साष्टांग नमस्कार करते हैं ॥६४॥
SR No.010851
Book TitleTraivarnikachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPannalal Soni
PublisherJain Sahitya Prakashak Samiti
Publication Year
Total Pages438
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size16 MB
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