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________________ १५२ सोमसेनमट्टारकविरचित खाय नमः । ॐ नीरजसे नमः । ॐ निर्मलाय नमः । ॐ अच्छेद्याय नमः । ॐ अभेद्याय नमः । ॐ अजराय नमः । ॐ अपराय नमः । ॐ अनसेयाय नमः । ॐ अगर्भवासाय नमः । ॐ अक्षोभ्याय नमः । ॐ अविलीनाय नमः । ॐ परमथनाय नमः । ॐ परमकाठयोगरूपाय नमः । ॐ लोकाग्रनिवासिने नमः । ॐ परमसिद्धेभ्यो नमः । ॐ अर्हत्सिद्धेभ्यो नमः । ॐ केवलिसिद्धेभ्यो नमः । ॐ अन्तकृत्सिद्धेभ्यो नमः ॐ परंपरसिद्धभ्यो नमः । ॐ अनादिपरमसिद्धेभ्यो नमः । ॐ अनाद्यनुपमसिद्धेभ्यो नमः । ॐ सम्यग्दृष्टे आसन्नभव्य निर्वाणपूजार्ह अग्नीन्द्राय स्वाहा ।। सेवाफलं पटपरमस्थानं भवतु । अपमृत्युनाशनं भवतु || पीठिकामन्त्राः ॥ पीठिकामन्तैरतः पत्रिंशभेदभिन्नैः प्रतिमन्त्रं त्रिवारमुच्चारितैः शाल्यन्नक्षीरघृतभक्ष्यपायसशर्करारम्भाफलमिलितैरन्नाहुतीः रुचा जुहुयात् ॥ १०८।। पुनराज्याहुतितर्पणपर्युक्षणानि ।। ५५ ।। ४'ॐ सत्यजाताय नमः " इत्यादि छत्तीस मंत्र पीठिका मंत्रोंका हरएकका तीन तीन वार उच्चारण करें प्रत्येकके अन्तमें, शाली, अन्न, दूध, घी, दूसरे खानेके पदार्थ, सौवा, शक्कर और केले इन सबको मिलाकर सूचीके द्वारा अन्नाहू ते देवे । यह भी १०८ वार हो जाती है इसके बाद फिर छह घृताहूति पांचतर्पण और एक पर्युक्षण करे ॥ ५५॥ ॥अथ पूर्णाहुतिः ।। ॐ तिथिदेवाः पञ्चदशधा प्रसीदन्तु । नवग्रहदेवाः प्रत्यवायहरा भवन्तु । भावनादयो द्वात्रिंशद्देवा इन्द्राः प्रमोदन्तु । इन्द्रादयो विश्वे दिक्पालाः पालयन्तु । अनीन्द्रमौल्युद्भवाऽप्यनिदेवता प्रसन्ना भवतु । शेषाः सर्वेऽपि देवा एते राजानं विराजयन्तु । दातारं तर्पयन्तु । संघ श्लाघयन्तु । वृष्टिं वर्पयन्तु । विघ्नं विघातयन्तु । मारी निवारयन्तु । ॐ ही नमोऽहते भगवते पूर्णज्वलितज्ञानाय सम्पूर्णफलाध्या पूर्णाहुति विदध्महे ॥ इति पूर्णाहुतिः ॥ ५६ ॥ ॐ तिथिदेवाः ” इत्यादि मंत्रोंके द्वारा पूर्णाहूति देवे । पूर्णाहुतिम फल और पूजाका द्रव्य होना चाहिए । पूर्णाहूतिके मंत्र पूर्ण हों वहां तक बराबर एक सरीखी परीकी धार छोड़ता रहे ॥१६॥
SR No.010851
Book TitleTraivarnikachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPannalal Soni
PublisherJain Sahitya Prakashak Samiti
Publication Year
Total Pages438
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size16 MB
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