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________________ त्रैवर्णिकाचार | यक्षार्चनमंत्र अथ वज्राग्रस्थापितचतुर्विंशतियक्षाः । ॐ नहीँ गोमुखमहायक्षत्रिमुखयक्षेश्वरतुम्चरुपुष्पाक्षमातङ्गस्यामजितब्रम्हेश्वरकुमारचतुर्मुखपातालकिन्नरगरुडगन्धर्वखगेन्द्रकुवेरवरुणभृकुटिगोमेद धरणमातङ्गाः सर्वेऽप्यायु धवाहन युवतिसहिता आयातायात इदमर्घ्यं गन्धमित्यादि गृह्णीत गृह्णीत स्वाहा ॥ यक्षार्चनम् ॥ ७० ॥ १३९ बत्तीस पत्तोंके चारों ओर बताये हुए चौवीस वत्रानोंपर स्थापित चोवीस यक्षोंकी " ओं ह्रीँ गोमुख " इत्यादि पढ़कर पूजा करै ॥७०॥ दिक्पाल व नवग्रह अथ दिक्पालः । ॐ इन्द्रानियमनैऋत्यवरुणपवनकुबेरेशानधरणसोमाः सर्वे प्यायुधवाहनयुवतिसहिता आयातायात इदमर्घ्यमित्यादि ॥ दिक्पालार्चनम् ॥ ७१ ॥ “ ओं इंद्राग्नि ” इत्यादि पढ़कर दिक्पालोंकी पूजा करै ॥ ७१ ॥ अथ ग्रहाः । ॐ आदित्यसोममंगलबुधबृहस्पतिशुक्रशनिराहुकेतवः सर्वेऽप्यायुधवाहनवधूचिन्हसपरिवारा आयातायात इदमर्घ्यं स्वाहा ॥ इति नवग्रहपूजा ॥ ७२ ॥ " ओं आदित्यसोम " इत्यादि पढ़कर नवग्रहोंकी पूजा करे ॥ ७२ ॥ अनावृतपूजा । ॐ ह्रीं क्र हे अनावृत आगच्छागच्छ अनावृताय स्वाहा ॥ इत्यनावृतपूजा ॥ ७३ ॥ “ ओं ह्रीँ ओं " इत्यादि पढ़कर अनावृत देवकी पूजा करै ॥ ७३ ॥ . : एवं महायन्त्रं समाराध्य मूलविद्यामष्टशतवारान् जपेत् ॥ इति देवताराधनविधिः ॥ ७४ ॥ इस तरह महा यंत्रकी पूजा कर मूल मंत्रको एकसौ आठ बार जपै ॥ ७४ ॥
SR No.010851
Book TitleTraivarnikachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPannalal Soni
PublisherJain Sahitya Prakashak Samiti
Publication Year
Total Pages438
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size16 MB
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