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________________ त्रैवर्णिकाचारः । १३१ इति पञ्चनमस्कारान् विन्यस्य । ॐ हीँ अर्ह वं मं हंसं तं पं अ सि.आ उ सा हस्तसम्पुटं करोमि स्वाहा ॥ इति हस्तौ सम्पुटेत् ॥ इति करन्यासः ॥ ३२ ॥ दोनों हाथों की कनिष्ठा आदिक उंगलियोंके मूलमें (नीचे) तीन रेखाओंके ऊपर, उन रेखाओं के ऊपर पहले पेरुएकी रेखाओंपर और दूसरे पेरुएकी रेखाओंपर क्रमसे और पांचों उगलियोंपर एक साथ पंच नमस्कार - मंत्रकी स्थापना कर " ओं ह्रीं अर्ह वं " इत्यादि मंत्र पढ़कर दोनों हाथ जोड़े । इसे करन्यास मंत्र कहते हैं ॥ ३२ ॥ ततोऽङ्गुष्ठयुग्मेनैव स्वाङ्गन्यासं कुर्यात् ॥ ॐ हाँ णमो अरिहंताणं स्वाहा । इति मन्त्रं हृदि ॥ ॐ -ही ँ णमो सिद्धाणं स्वाहा । ललाटे ॥ ॐ हूँ णमो आयरियाणं स्वाहा | दक्षिणकर्णे || ॐ हूँ णमो उवज्झायाणं स्वाहा । पश्चिमे ॥ ॐ न्हः णमो लोए सव्वसाहूणं स्वाहा । वामकर्णे || ॐ हाँ णमो अरिहंताणं स्वाहा ॥ शिरोमध्ये || ॐ न्हीं णमो सिद्धाणं स्वाहा । शिरोऽशेयभागे ॥ ॐ हूँ णमो आयरियाणं स्वाहा । नैर्ऋत्ये ॥ ॐ व्हाँ णमो उवज्झायाणं स्वाहा । शिरोवायव्याम् ॥ ॐ हः णमो लोए सव्वसाहूणं स्वाहा | शिर ईशान्ये ॥ इति द्वितीयन्यासः ||३३|| इसके बाद हाथके दोनों अंगूठोंसेही स्वांगन्यास करे । उसकी विधि इस प्रकार है। “ओं ह्राँ णमो अरिहंताणं स्वाहा'' इस मंत्र को पढ़कर दोनों अंगूठोंसे हृदयको "ओं हीं णमो सिद्धाणं स्वाहा " इसे पढ़कर ललाटको " ओं हूँ णमो आयरियाणं स्वाहा " इसे पढ़कर दाहिने कानको " ओं ह्रौं णमो उवज्झायाणं स्वाहा " इसे पढकर शिरके पिछले भागको " ओं ह्राँ णमो लोए सव्यसाहूणं स्वाहा " इसे पढकर वायें कानको “ ओं ह्राँ णमो अरिहंताणं स्वाहा " इसे पढकर शिरके मध्यभागको " ओं ह्रीं णमो सिद्धाणं स्वाहा " इस मंत्रका उच्चारण कर शिरके आग्नेय भागको “ ओं हूं णमो आयरियाणं स्वाहा,, इसका उच्चारण करके सिरके नैऋत्य भागको " ओं हों णमो उवझायाणं स्वाहा " इसका उच्चारण कर सिरके वायव्य भागको “ ओं हः णमो लोए सव्वसाहूणं स्वाहा इसका उच्चारण कर" शिरके ईशान भागको स्पर्शन करे । इसका नाम द्वितीय न्यास है। न्यास नाम रखनेका है इस लिए इन मंत्रों का उच्चारण कर हाथके दोनों अंगूठों को हृदयादि स्थानों पर रखना चाहिए ॥ ३३ ॥ ॐ हाँ णमो अरिहंताणं स्वाहा । दक्षिणे भुजे ॥ ॐ हाँ णमो सिद्धाणं स्वाहा || वाम भुजे ॥ ॐ हूँ णमो आयरियाणं स्वाहा ।
SR No.010851
Book TitleTraivarnikachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPannalal Soni
PublisherJain Sahitya Prakashak Samiti
Publication Year
Total Pages438
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size16 MB
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