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________________ ७६ फूलोका गुच्छा। Annourn काम फिरने करने लगा। बीचकी रातका व्यापार मानो उसके लिए एक स्वप्नके "समान हो गया ! डाँकूने जो पुरानी तलवार दी थी, उसे कमलाप्रसादने अपने सोनेके कमरेकी एक दीवालपर लटका दी थी। उसे देखते ही उस रातकी सारी घटना उसके नेत्रोंके सामने प्रत्यक्ष रूप धारण करके नृत्य करने लगती थी। दिनभर काम करनेके बाद रातको जब वह घर आता था, तब रुपयों का शोक उसे फिर ‘नया होकर पीड़ित करने लगता था और निरुत्साह उसके दिलको बिलकुल तोड़ देता था। वह सोचता था कि-"क्या अब गिरवी रक्खी हुई जमीनका उद्धार हो सकता है ? और क्या अब भाईकी खोज करके मैं माताके शोकको दूर सकूँगा ?" उसकी सारी आशायें-सारे भरोसे मिट्टीमें मिल गये। उस रातकी घटनाको भूलनेकी यद्यपि वह बहुत चेष्टा करता था, परन्तु वह तलवार उस दुर्घटनाके स्मरणको हररोज ताजा कर देती थी। जिस समय उस डॉकूके घरकी स्त्रीकी बात उसे याद आती थी उस समय उसका मन कृतज्ञतासे भर जाता था। मेरी रक्षा करनेके लिए उसने कितना कष्ट सहन किया ! वह मन-हीमन सोचता था कि उसके ऋणको क्या अब मैं इस जन्ममें कभी चुका सकूँगा? अंतमें उसे उस तलवारको अपने नेत्रोंके सामने रखना असह्य हो गयां । 'पहले वह नहीं सोच सका कि मैं उसका क्या उपयोग करूँ; परन्तु पीछे उसने उसे पुरानी चीजोंकी दूकानपर बेच आनेका निश्चय किया। गाँवमें थोड़ी दूरपर पुरानी चीजोंकी एक दूकान थी। एक दिन वह उस तलवारको लेकर वहां गया। दूकानदार वृद्ध था-उसकी आँखोंकी ज्योति कम हो गई थी। वह उस तलवारको आँखोंके बिलकुल समीप ले जाकर गौरसे देखने लगा । देखते देखते जब उसकी दृष्टि एक स्थानपर पड़ी, तब वह चौंक पड़ा और बोला''यह चीज तो बहुत कीमती है!" कमलाप्रसाद चुप हो रहा। दूकानदारने फिरसे कहा-" इसपर बादशाहकी छाप है-यह कीमती तलवार है !" कमलाप्रसादने पूछा-कितने मूल्यकी है ? "डेढ़ हजारकी !" डेड हजार ! कमलाप्रसाद चौंक पड़ा । यदि ऐसा है तो इससे तो उसके सारे दुःख दूर हो सकते हैं!
SR No.010681
Book TitleFulo ka Guccha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNathuram Premi
PublisherHindi Granthratna Karyalaya
Publication Year1918
Total Pages112
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size13 MB
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