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________________ २२० | वीर्षकर महावीर क्षत्रियकुर का सुयोग्य राजकुमार था और बड़े तीन बैराग्य के साथ युवावय में ही विषय-वासना से मुक्त होकर पांचसो क्षत्रिय कुमारों के साथ संयम ग्रहण किया था। जमालि की पत्नी (महावीर की पुत्री) प्रियदर्शना भी एकसहस्र कुलीन स्त्रियों के साथ भगवान के समवसरण में दीक्षित हुई थी। जमालि की प्रव्रज्या का वर्णन पृष्ठ १६० पर किया जा चुका है। उसके आगे-भगवान् का विरोधी बनने का इतिहास भगवती सूत्र' में प्राप्त होता है। भगवान महावीर विहार करते हुए ब्राह्मणकुंड के बहुसाल चैत्य में पधारे ।' जमालि अनगार के मन में स्वतन्त्र विहार की भावना जगी, वे भगवान के निकट आकर बोले-'मंते ! यदि आपकी आज्ञा हो तो मैं अपने पांच सौ शिष्यों के साथ पृथक विहार करना चाहता हूं।" महावीर जमालि की अस्थिर मानसिक स्थिति से परिचित थे। उन्होंने कुछ भी उत्तर नहीं दिया । जमालि ने तीन बार अपना आग्रह दुहराया, पर महावीर मौन रहे । मौन सदा स्वीकृति का ही नहीं, कभी-कभी निषेध का भी सूचक होता है, जमालि ने इस पर चिंतन नहीं किया। वह भगवान् के मौन की स्पष्ट अवगणना कर अपने पांच सौ शिष्यों के साथ स्वतंत्र विचरने लगा। प्रियदर्शना भी जमालि के प्रति अनुरागवश एक हजार श्रमणियों के साथ जमालि का अनुगमन करने लगी। स्वतंत्र विहार करते हए भी जमालि कठोर तप का आचरण करता रहा । महावीर की दृष्टि में जमालि अनगार कठोर तपश्चर्या का अधिकारी नहीं था, किंतु जमालि हठपूर्वक तप का आचरण करता ही रहा, इस हठाग्रह से आचरित तप के कारण उसका तन-बल तो भीण हा ही, मनोबल भी क्षीण होता गया। महावीर तप के साथ तितिक्षा और श्रम के साथ शिक्षा (ज्ञान) पर बल देते थे, जमालि उनका एकांगी आचरण कर रहा था। इस कारण धीरे-धीरे उसका शरीर कृश होता गया, वह पित्त-ज्वर से ग्रस्त होकर चिड़चिड़े स्वभाव का बन गया। ___ एक बार जमालि विहार करता हुमा श्रावस्ती के तिंदुक उद्यान में ठहरा ।। व्याधिजन्य वेदना के कारण उसे सोने की इच्छा हुई, अपने शिष्यों से संस्तारक (बिछोना) बिचाने के लिए कहा। शिष्य कार्य में जुट गये । जमालि को बैठे रहने में अधिक वेदना हो रही थी। वेदना की व्याकुलता में एक क्षण भी उसे मुहूर्त जितना लंबा प्रतीत होने लगा, दूसरे ही क्षण पूछा - "क्या संस्तारक कर दिया ?" १ शतक ९, उ०३३ २ दीक्षा का २वां वर्ष । वि०पू० ४६९-YEE पीमा का सताईसवां वर्ष १ वि.पृ.४८६ । गौशासक के विद्रोह के पवार
SR No.010569
Book TitleTirthankar Mahavira
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Ratanmuni, Shreechand Surana
PublisherSanmati Gyan Pith Agra
Publication Year1974
Total Pages308
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size16 MB
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