________________
२६ - सम्यक्त्वपराक्रम (१)
का कीडा भी द्रव्य - अप्रमाद का सेवन करता रहता है । रेशम का कोडा अपने शरीर की रक्षा के लिए अपना घर साथसाथ ही लिये फिरता है । इस प्रकार वह क्षुद्र कीडा भी अपने शरीर की रक्षा का उद्योग करता है । इसका अर्थ यह नही है कि मैं आपको अपने शरीर की रक्षा न करने का उपदेश दे रहा हू । मेरे कथन का आशय यह है कि द्रव्यअप्रमाद सर्वानुभव- सिद्ध है और ऐसा अप्रमाद तो मामूली कीडा भी सेवन करता है ।
शरीर, कुटुम्ब, घर-द्वार तथा धन-दौलत आदि वस्तुओ मे से कोई भी वस्तु साथ मे परलोक नही जाती । उनसे आत्मा का कल्याण भी नही होता । फिर भी शास्त्रकार उन चीजो के प्रति उपेक्षा करने का उपदेश नही दे रहे हैं । वह सिर्फ यही कहते हैं कि इनकी रक्षा के लिए किये जाने वाले प्रयत्न या उद्योग को द्रव्य - अप्रमाद ही समझो। इसे भाव - अप्रमाद मत मानो । द्रव्य- अप्रमाद अनादिकाल से आत्मा के साथ लगा हुआ है, फिर भी उससे आत्मा का कल्याण नही हुआ । प्रार्थना मे कहा है
दियौ घेरो ।
खल दल प्रबल दुष्ट प्रति दारुण, ज्यों चौतरफ तदपि कृपा कृपा तुम्हारी प्रभुजी, श्ररियन होय होय प्रकटै चेरो ॥
जब दुष्ट लोग तलवार लेकर घेर ले और मस्तक पर प्रहार करना चाहे, तब ऐसे सकट के समय भी- अगर परमात्मा का स्मरण किया जाये तो शत्रु भी नम्र बन जाता है । वे शत्रुता का त्याग कर दास की भाँति आज्ञाकारी हो जाते हैं । दुष्ट का नाश न चाहते हुए दुष्ट की दुष्टता का नाश