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________________ ४६८ जिनहर्ष ग्रन्थावली धान न खायै धापिन रे, दीठो न रुचै नीर ॥धा। नीसासा नांखें घणा रे, सांभलि नणद रा वीर व ४ का गात्र गलै नस नीकले रे, झरि-झुरि पंजर होई || प्रेम तणे वसि जे पड़े रे, तेह गमै भव दोइ ॥ ५॥ राति दिवस मन में रहै रे, जिणेसुं अविहड़ नेह ॥धा . वीसारंत न वीसरे रे, दाझै खिण खिण देह ॥ध ६क|| माथै वदनामी चढे रे, लागै कोड़ि कलङ्क ॥ध।। जीव तणा सांसा पड़े रे, जोई रावणपति लकं ॥ध ७ का। पर नारी ना संग थी रे, भलो न थाय नेठ ॥ध ॥ जोवौ कीचक भीमडै रे, दीधा कुंभी हेठ ॥ध ८ का धायै लंपट लालची रे, घटती जाये ज्योति ॥३॥ जैत न थायै तेहनी, रे, जिम राइ चंडप्रद्योत ॥धक। पर नारी विष वेलड़ो रे, विष फल भोग संयोग । आदर करि जे आदरै रे, तेहन भवि-भवि सोग ॥ध १० का। वाल्हा माहरी बीनती रे, साच करे ने जांण ध। कहै जिनहर्ष संभारिज्यो रे, हियड़े आगम वाण ध॥११॥ माया स्वाध्याय ढाल-अरघ मडित नारी नागिला रे एहनी माया धूतारि माह्या मानवी रे, काई मोह्या मोटा मोटा राजा राणरे सिधसाधक जोगी जी रे, खान मुलक सुलताण रे ॥१मा॥ -
SR No.010382
Book TitleJinaharsh Granthavali
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAgarchand Nahta
PublisherSadul Rajasthani Research Institute Bikaner
Publication Year1962
Total Pages607
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size18 MB
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