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________________ १६२) (जैन पाठावली । उधर राजा उग्रसेन ने भी बडी भारी तैयारी की। जहाँ समुद्रविजय जैसे समधी हो और वासुदेव जैसे बराती हो तो उनके स्वागत की तैयारीयाँ भी वैसी ही होनी चाहिए । वरात धीरे धीरे चलती हुई उग्रसेन राजा के महल के पास आ पहुंची। सामने के छज्जे मे, राजीमती सोलह सिंगार सज कर वैठी थी। उसकी सखियाँ भी नेमिकुमार को देख रही थी। उनमें से एक ने कहा-धन्य है सखी, तुम्हारा सफल जीवन धन्य है | नेमिकुमार जैसे नाथ मिलना अहोभाग्य की बात है । दूसरी सखी बोली-जिसने पूर्व जन्म मे बहुत पुण्य किया हो, उसी को ऐसे प्रियतम मिल सकते हैं। तव तीसरी सखी ने कहा-मगर राजुल जैसी प्रियतमा पाने वाला क्या कम पुण्यशाली है ? (इस प्रकार सखियां आपस मे बतचीत कर रही हैं। राजीमती के हर्ष का पार नही है । ) इसी समय नेमिनाथ का रथ वापिस लौट पडा। रग में भग हो गया । राजुल और उनकी सखियां भी हैरान थी। हो क्या गया ? मालूम हुआ-नेमिनाथ पशुओ की पुकार सुनकर विरक्त हो गये है । वे अव विवाह नहीं करेगे। बात यो हुई । वरातियो में कोई मामाहारी भी हो । सकता है । यह खयाल करके उग्रसेन ने पशुओ और पक्षियो को भंगवा कर वाड में और पीजरो मे बन्द कर रखा था। इन
SR No.010283
Book TitleJain Pathavali Part 03
Original Sutra AuthorN/A
AuthorTrilokratna Sthanakwasi Jain Dharmik Pariksha Board Ahmednagar
PublisherTilokratna Sthanakwasi Jain Dharmik Pariksha Board Ahmednagar
Publication Year1964
Total Pages235
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size6 MB
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