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________________ कांइकविणांगुंथावतीरेहां, किणकिणकपणमन्न । ।।मु० ॥२॥ किहांकिहांरंगवधवणारेहां, किहीं रुंधेबार ॥ मु० ॥ किहांकिहालीप्यांांगणारेहां, किहांकिहांबालशनार ॥मु०॥३॥ केएकबाल कधवावतीरेहां, केयकनारीपात ॥ मु० ॥ उमा सलगेपरीसासह्यारेहां, नाण्योकिरपणमन ॥ म० ॥४॥ दूरदेखीपावलेरेहां, पिणमनमाहेशुद्ध ॥ मु० ॥ मूलनपंडेअसुजतोरेहां, निर्मलंलेश्या रूडीबुद्ध ॥ मु०॥५॥तिणअवसर पूछेहरीरेहां, मुनिवरसेंहसअठार ॥ मु० ॥ उत्कृष्टाकुणएहमें रेहां, मुजनेकहोआपविचार ॥ मु० ॥६॥ श्री नेमकहेसुतताहरोरेहां, ढंढणदूकरकार ॥ मु० ॥ आजकेवलज्ञानपामशेरेहां, कृष्णमनहरखअपार म०॥७॥ कृष्णकहेढंढणकिहारहां, हंवांद वारंवार ॥ म० ॥ श्रीनेमकहेघरेजावतारेहां, मी लशेराजदुवार ॥ मु० ॥ ८ ॥ ढंढणनेवांदणतणो रेहां, मनमेहर्षअपार ॥ मु०॥ श्रीनेमजिणंदने चांदनेरेहां, आवेराजदुवार ॥ मुं० ॥९॥ मार गमाहेसाहमोमिल्योरेहां, गुणवंतदुर्बलसात॥ति नप्रदतणादइकरीरेहां, नावसुंवांद्यासुपात्र ॥मु.
SR No.010224
Book TitleJain Dharm Gyan Prakashak Pustak
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNana Dadaji Gund
PublisherNana Dadaji Gund
Publication Year
Total Pages211
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size15 MB
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