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________________ ( ८० ) होतो खोटी नीत ए। रहती घणा ने अप्रतित ए। रह्यो मिथ्या मत राच ए। कुण माने पापो से साच ए॥ १२ ॥ म्हारो कुटम्बौ लोग लााय ए। पछै लाग सुथारे पाय ए। नर नारी जाने नेहयो ए। भो पनड नमायो एहवी ए॥ १३ ॥ तब बोलाा मुनिराय ए। राय ज्यू तोमे सुख थाय ए। हिवे नगरौ माही भाय ए।' कुटम्व मेलो कियो राय ए ॥ १४ ॥ व्याही न्याति लोग ए। घणाई मिलियो छै थोक ए। सूरिकन्तादिका राणियां ए। राजा रथ वैसाणी में आणीया ए॥ १५ ॥ अधिक्षा धर्म सु प्रेम ए। राजा चढियो कोणक जेम ए। गजहोदे मसवार ए। राजा चाला मध्य बाजार ए॥ १६ ॥ मृग बन मेडो याय ए। हेडो उतरियो राय ए। देखे सहु परवारए ।खमावे बारम्वार ए ॥ १७ ॥ लोक सहु सन जागियो ए। पापी में पड पाणियो ए। धन २ कोसौ खाम ए। प्रदेशी रा सान्या काम ए॥ १८॥ लोक सहु मन भावियो ए। खामी इसड़ा ने नमावियो ए । मोटा जिन मारग वहे ए। तो पाखंडी दविया रहें ए ॥ १६ ॥ त्रो धर्म के रानवियां तणेर ए बले सांचे मन करै तां तणाए। शूरवीर रो छ सही ए । इहां जात रो कारण नहीं ए। २० ॥ समझयो प्रदेशी राय ए। अायो घणा जगारी
SR No.010206
Book TitleJain Bhajan Sangraha 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorFatehchand Chauthmal Karamchand Bothra Kolkatta
PublisherFatehchand Chauthmal Karamchand Bothra
Publication Year
Total Pages193
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size6 MB
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