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कहणी नांवे कोय ॥ पद्म० ॥ २॥ सम दम उपशम रस भरी, प्रभु आप रौ बाणि २ । त्रिभुवन तिलक तूही सही, तूं ही जनक समान ॥ पद्म० ॥३॥ तूं प्रभु कल्पतरू समो, तूं चिन्तामगिा जोय २। समरण करतां आपरो, मन वंछित होय ॥ पद्म० ॥ ४ ॥ सुखदायक सहु जग भणी. ही दीन दयाल २ । शरणे
आयो तुज साहिवा, तूही परम कृपाल ॥ पद्म० ॥ ५॥ गुण गातां मन गहगहे, सुख सम्पति जाग २ । विघ्न मिटै समरण किया, पामै परम कल्याग । पट्म० ॥ ६ ॥ सम्बत् उगणीसे ने भाद्रवे, सुदि वारस देख २ । पदम प्रभु रट्या लाडनू, हुयो हर्ष विशेष ।। पटम० ।। ७ ॥
श्री सुपास जिन स्तवन ।
(कृपण दीन अनाथ ए एदेशी) सुपास सातमां जिणंद ए,. ज्यांने सेवे सुर नर छन्द ए। सेवक पूरण पाश ए, भजिये नित्य खामि सुपास ए॥ १॥ ए आंकड़ो। जन प्रति वोधया काम ए, प्रभु वागरे वाण अमाम ए। संसार स्यू हुवै उदास ए॥ भ० ॥ २॥ पामै काम भोग थी उद्देश ए, वलि उपजै परम सवेग ए। एहवा तुम वच सरस-विलाम