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________________ ९४ जैन राजतरंगिणी स प्राकृत इव व्याजमैत्रीं कुर्वन् गृहागतः । लोभादन्याँन्लवन्यांस्तानन्यान् वित्तेरवञ्चयत् ।। ६९ ।। ६९. लोभवश, वह सामान्य जन के समान घर आकर मित्रता का बहाना बनाते ( कपटमैत्री करते हुए उन लवन्यों को धन से ठग लिया । नीता जारकृताद् युक्त्या सभयास्ताडयन् स्त्रियः । तदुक्त्यादण्डयत् यस्य ग्रामीणान् सेवकव्रजः ॥ ७० ॥ [१:३ ६९-७० ७०. युक्तिपूर्वक ले जायी गयी जार' कृत भयभीत स्त्रियों को प्रताड़ित करते हुए, सेवक समूह ने उसके कहने पर ग्रामीणों को दण्डित किया। उसके पाद-टिप्पणी : बम्बई का ६८वाँ श्लोक तथा कलकत्ता की २८२वीं पंक्ति है । नयान का पाठ सन्दिग्ध है। ६९. ( १ ) लवन्य कल्हण ने 'लवन्य' वर्ग का सर्वप्रथम उल्लेख राजा हर्प (सन् १०९६११०१ ई० ) के प्रसंग में किया है ( रा० : ७ : ११७१) । कल्हण के समय से जोनराज एवं श्रीवर के समय तक लवन्यों का उल्लेख मिलता है। शुक ने उनका उल्लेख नहीं किया है। इससे प्रकट होता है। कि लवन्य मुसलिम बनकर, अपनी स्वतन्त्र वर्गीय स्थिति समाप्त कर चुके थे । हिन्दू राज्य पतन के कारण थे । कल्हण ने उनके आतंक एवं उपद्रव का वर्णन तरंग ७ तथा ८ मे किया है। जोनराज ने हिन्दूकालीन इतिहास में उन्हे अराजक रूप में चित्रित किया है । मुसलिम राज स्थापित होने के पश्चात् उनका सुलतानों ने दमन किया। वे लोप हो गये । जोनराज काल तक वे काश्मीर के राजनीतिक एवं सामाजिक जीवन में महत्वपूर्ण भाग लेते रहे हैं । अनेक गृहयुद्धों के जनक होकर, अन्त में हिन्दू राज्य के विघटन के कारण हुये । ग्यारहवी शती में लवन्य ग्रामीण कृषक रूप में चित्रित किये गये हैं। तन्त्रियों के समान उनका नाम अब तक ग्रामों में 'जन' शब्द से प्रचलित है। यह शब्द लवन्य का अपभ्रंश है । 'लुन' काश्मीर उपत्यका में चारों ओर ग्रामीण क्षेत्रों में बिखरे है। लॉरेन्स का मत है कि वे विलास से काश्मीर में आये थे ( वैली ऑफ काश्मीरी : ३०६ ) | परन्तु स्तीन का मत है कि 'लुनो' मे इस प्रकार की कोई परम्परा प्रचलित नहीं है। लॉरेन्स के अनुसार काश्मीर क्रम मे लोन या लुन लोग वैश्यो के वशज माने जाते है । (द्रष्टव्य टिप्पणी जोन० राज० श्लोक : १७६ : १७७ : २५२ ) । पाट- टिप्पणी : बम्बई संस्करण का ६९ तथा कलकत्ता संस्करण का उक्त श्लोक २८३वी पंक्ति है । 'चार' के स्थान पर बम्बई का 'जार' पाठ रखा गया है। 'स्ताऽथन' पाठ सन्दिग्ध है । विवाहित स्त्री जिस पुरुष के साथ प्रेम या अनुचित ७०. (१) जार : उपपति = प्रेमी = आशिक; सम्बन्ध करती है, उस पुरुष को जार कहते है । परायी स्त्री से सम्बन्ध रखने वाला पुरुष जार कहा जाता है - रथकारः सेवकां भार्यां सजारां शिरसा वहत् — पंचतन्त्र = ४ : ५४ । जार कृत शब्द का तात्पर्य • विचारणीय है । जार के पास रहने वाली कभी की आचरणवान स्त्री से तात्पर्य है, जो जार के पास स्त्रीवत् बन जाती है ।
SR No.010019
Book TitleJain Raj Tarangini Part 1
Original Sutra AuthorShreevar
AuthorRaghunathsinh
PublisherChaukhamba Amarbharti Prakashan
Publication Year1977
Total Pages418
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size35 MB
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