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________________ जैनराजतरंगिणी [१:१:१००-१०३ खलोक्तिश्वासमालिन्यं सततं नयसेविनः । हृदयादर्शवैषद्योत्स्रंसकं नाश्य दृश्यते ॥ १०० ॥ १००. 'निरन्तर नीतिसेवी, इस राजा के हृदय दर्पण की स्वच्छता को खलोक्ति स्वास' मलिन नहीं कर सका। निर्वाणगोष्ठीनिष्ठस्य तद्वच्छास्त्रविवेकिनः । कृपाब्धेरस्य नो किञ्चित् कृत्यमस्त्यसुखप्रदम् ॥ १०१ ॥ १०१. 'निर्वाणगोष्ठी-निष्ट' और उसी प्रकार शास्त्र विवेकी एवं कृपासागर इसका कोई कार्य कष्टप्रद नहीं था। तदुग्धपितृपक्षोऽपि स्वामिभक्ति न सोऽत्यजत् । तेनैवान्त्यक्षणः श्लाघ्यस्तस्याभूज्जैनभूपवत् ।। १०२ ॥ १०२. 'पितृद्रोही पक्ष के प्रति भी उसने स्वामिभक्ति नहीं त्यागी। इसी कारण जैन भूपति की तरह उसका अन्तिम क्षण प्रशंसनीय हुआ। सौहार्दमार्दवोपेता योग्या कार्यविचक्षणा । जाने तेनैव पुण्येन सन्ततिस्तस्य राजते ॥ १०३ ॥ १०३. 'मानो इसी कारण उसकी सोहार्द मार्दव से प्राप्त योग्य, कार्य में चतुर सन्तति शोभित हो रही है। पाद-टिप्पणी: पाद-टिप्पणी: १००. (१) स्वास : यदि शीशा या दर्पण के १०२. (१) श्लोक संख्या १०२ तथा १०३ समीप स्वास लिया जाय, तो दर्पण पर बाष्प जमकर, प्रक्षिप्त प्रतीत होते हैं। परन्तु कलकत्ता एवं बम्बई उसे किंचित काल के लिए मलिन बना देता है। किन्तु दोनों संस्करणों में है । अतएव उन्हे यहाँ स्थान दिया यह मलिनता स्वास प्रक्रिया के दर्पण से हटते ही, गया है। श्रीकण्ठ कौल का मत ठीक है। कलकत्ता समाप्त हो जाती है। संस्करण के प्रथम सर्ग में १७७ तथा बम्बई संस्करण पाद-टिप्पणी : में १७६ श्लोक है। होशियारपुर संस्करण में केवल १०१. (१) निर्वाणगोष्टी-निष्ठ : जैनुल १७४ श्लोक है। उक्त दो १०२ तथा १०३ श्लोक अधिक है। उन्हे बम्बई संस्करण के श्लोक संख्या आबदीन दार्शनिक था। वह संस्कृत भाषा तथा १७६ मे से घटा दिया जाय तो वह श्रीकण्ठ कौल के फारसी जानता था। अकबर के समान वह विद्वानों संस्करण के अनुसार १७४ श्लोक हो जाता है। से दार्शनिक तत्त्वों एवं धर्म के गूढ़ भावों को समझने कलकत्ता संस्करण में उक्त दोनों श्लोकों के अतिरिक्त का प्रयास करता था। इस प्रकार की आध्यात्मिक १७७ वा श्लोक अधिक है। कलकत्ता संस्करण में श्रीकण्ठ कौल की अपेक्षा श्लोक १०२, १०३ तथा चर्चा किंवा गोष्ठी की संज्ञा श्रीवर ने निर्वाणगोष्ठी १७७ अधिक है। यदि वह तीनों श्लोक कलकत्ता से दिया है। इसका उल्लेख पुनः श्रीवर ने नही संस्करण से घटा दिये जायँ, तो उनकी संख्या किया है। श्रीकण्ठ कौल संस्करण से मिल जाती है।
SR No.010019
Book TitleJain Raj Tarangini Part 1
Original Sutra AuthorShreevar
AuthorRaghunathsinh
PublisherChaukhamba Amarbharti Prakashan
Publication Year1977
Total Pages418
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size35 MB
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