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मुखपत्ती-चर्चा
१-"अंगचूलिया शास्त्र-४३ सूत्र में कहा है कि पुट्वि पत्ति पोहिय वंदणं दाओ । अर्थात् पहले मुख को वस्त्र से ढाँककर पीछे वन्दना करे ।" यदि मुंह बंधा होता तो मुख ढाँकने को क्यों कहते ? २-"चउरंगुल पायाणं, मुंहपत्ति उज्जूए, उव्वहत्थ रयहरणं । वोसट्ठ चत्त देहो काउस्सग्गं करिज्जाहि ॥"
(आवश्यक नियुक्ति गाथा १५४५) व्याख्या - चउरंगुलत्ति चत्तारि अंगुलानि पायाणं अंतरं करेयव्वं । मुहपत्ति मुहपोत्तिं उज्जोएत्ति दाहिणहत्थेण मुंहपोत्तिया घेतव्वा, उव्वहत्थे रयहरणं कायव्वं । एतेण विहिणा वोसट्ठ चत्तदेहो त्ति पूर्ववत् काउस्सग्गं करिज्जाहि त्ति गाथार्थः ।
इस गाथा में कायोत्सर्ग की विधि का वर्णन है। कायोत्सर्ग के लिये इस प्रकार खडे होना चाहिये, जिससे दोनों पैरों के बीच में चार अंगुल का अन्तर हो । तथा दक्षिण (दाहिने) हाथ में मुहपत्ती एवं वाम (बायें) हाथ में रजोहरण रखना । दोनों भुजाओं को लम्बी लटका कर सीधे खडे होकर शरीर का व्युत्सर्ग करते (शरीर को वोसराते) हुए ध्यानारूढ होना चाहिये । यह काउस्सग्ग (कायोत्सर्ग) की विधि है । इस गाथा से कायोत्सर्ग करते समय मुखवस्त्रिका को दाहिने (सीधे) हाथ में रखने का स्पष्ट निर्देश है। मुखवस्त्रिका के काम आनेवाला वस्त्र खंड(?) । 'हस्तकं, मुखवस्त्रिका और मुखाँतक' ये तीनों पर्यायवाची शब्द हैं।
१-(क) अ० चू० ससि सोवरियं हस्संतं हत्थगं । २-(ख) जि० चू० पृ० १८७-हत्थगं मुखपोतिया भण्णइ त्ति ।
३-(ग) हा० टी० पृ० १७९-हस्तकं मुखवस्त्रिकारूपं । (तुलसी गणि संपादित दशवैकालिक)
Shrenik/DIA-SHILCHANDRASURI/ Hindi Book (07-10-2013)/(1st-11-10-2013) (2nd-22-10-2013) p6.5
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