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________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir दसपं ठाणं १५३ यधाते सारखणोवधाते, दसविधा विसोही पन्नता तं जहा-उग्गमविसोही उप्पयणविसोही एसणविसोही परिकम्मविसोही परिहरणविसोही नाणविसोही दंसणविसोही चरित्तविसोही अचियत्तविसोही सारकअखणविसोही १७३८1-738 (९३६) दसविधे संकिलेसे पन्नत्ता तं जहा-उबहिसंकिलेसे उवस्सयसंकिलेसे कसायसंकिलेसे भत्तपाणसंकिलेसे पणसंकिलेसे वइसंकिलेसे कायसंकिलेसे नाणसंकिलेसे दसणसंकिलेसे चरित्तसंकिलेसे दसविहे असंकिलेसे पन्नत्ता तं जहा-उवहिअसंकिलेसे चरित्तअसंकिलेसे १७३९] -739 (९३७) दसविधे घले पन्नता तं जहा-सोतिंदियवले चक्खिदियबले धाणिदियबले जिभिदिववले फांसिदियवले नाणवले दसणवले चरित्तवले तवबले वीरियवले ७४०1-740 (९३८) दसविहे सच्चे पन्नत्ता (तं जहा) - ७४१-91-741-1 (९३९) जणवप सप्पय ठवणा नामे रूवे पडुयस य बवहार भाव जोगे दसमे ओवम्मसच्चे य ||१५०11-1 (९४०) दसविधे मोसे पन्नत्ता (तं जहा) - |७४१-२।-741-2 (९४१) कोधे माने माया लोभे पिज्जे तहेव दोसे य ___ हास मए अक्खाइव उवधात निस्सिते दरामे । ॥१५१॥-2 (९४२) दसविधे सच्चामोसे पन्नत्ता तं जहा-उप्पन्नमीसए विगतमीसए उप्पन्नविगतमीसए जीवमीसए अजीवमीसए जीवाजीवमीसए अनंतमीसए परित्तमीसए अद्धामीसए अद्धद्धामीसए १७४१1-741 (९४३) दिठिवावस्स णं दस नामधेजा पन्नत्ता तं जहा-दिहिवाएति वा हेऽवाएति वा भूषवाएति वा तच्चावाएति वा सम्मावाएति वा धम्मावाएति वा भासाविजएति वा पुच्चगतेति वा अनुजोगगतेति वा सव्वपाणभूतजीवसत्तसुहावहेति वा ।७४२१-742 (९४४) दसविधे सत्थे पनत्ता (तं जहा)- १७४३-1-743-1 (९४५) सत्थमागी विसं लोण सिणेहो खारमविलं दुप्पउत्तो मणो वाया काओ भावो य अविरती (९४६) दसविहे दोसे पन्नत्ता (तं जहा)- १७४३-१1-743-2 (९४७) तज्ज्ञातदोसे मतिभंगदोसे पसत्थारदोसे परिहरणदोसे सलक्खाण-कारण-हेउदोसे संकामणं निग्गह-वत्युदोसे॥१५३||-1 (९४८) दसविधे विसेसे पनत्ता (तं जहा) - १७४३-३-७४३- 743-3-743 (९४९) वत्यु तज्जातदोसे य दोसे एगट्टिएति य कारणे य पडुप्पण्णे दोसे निचेहिय अट्ठमे अत्तणा उवणीते य विसेसेति य ते दस ॥१५४॥-1 (९५०) दसविधे सुद्धवायाणुओगे पन्नत्ता तं जहा-चंकारे मंकारे पिंकारे सेयंकारे एगत्ते पुधत्ते संजूहे संकामित्ते भिन्न ७४४|-744 (९५१) दसविहे दाणे पन्नता तं जहा - ७४५-११-745-1 ||१५२||-1 For Private And Personal Use Only
SR No.009729
Book TitleAgam 03 Thanam Angsutt 03 Moolam
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherAgam Shrut Prakashan
Publication Year1996
Total Pages170
LanguagePrakrit
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Agam 03, & agam_sthanang
File Size3 MB
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