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________________ ज्ञाताधर्म' कथासूत्रे ३४ सीहेणं' घुसिंहेन पुरुषेषु सिंह इव रागद्वेपादिशत्रु पराजयेदृष्टाद्भुत पराक्रमत्वात्, तेन 'पुरिसवरपुंडरीपूर्ण' पुरुपवर पुण्डरीकेण= पुण्डरीकं कमल, वरं च तत्पुण्डरीकं चरपुण्डरीकं मधानकमलं, पुरुषो वरपुण्डरीकमिवेत्युपमितसमासे पुरुषवरषुण्डरीकं तेन | भगवतो वरपुण्डरोकोपमा च विनिर्गताखिलाशुभमलीमसत्वात् सर्वैः श्रमानुभावः परिशुद्धत्वाच्च । यद्वा-यथा कमलं पङ्काज्जातमपि सलिले वर्द्धितमपि - चोभयसम्वन्धमपहाय निर्लेपःसदा जलोपरि वर्त्तते, निजानुपम गुणगणवलेन गुरासुरनरनिकर शिरोधारणीभूतयाऽति महनीय परमसुखास्पदं च भवति तथाऽयं भगवान् कर्मपङ्काज्जातो भोगाम्भोद्धितोऽपि निर्लेपस्तदुभयमतिवर्त्तते, गुणसम्पदास्पदतया च केवलज्ञानादिगुण मात्रादखिल भव्यजनशिरोधारणीयो भवतीति । विशेषण से युक्त हुए हैं । रागद्वेष आदि अन्तरंग शत्रुओं को पराजित करने में प्रभुने अपना अद्भुत पराक्रम प्रकट किया है इसलिये उन्हें पुरुषों में सिंह जैसा कहा गया है | भगवान " उत्तम पुण्डरीक (कमल) जैसे पुरुष थे, कारण उनकी आत्मा से अखिल अशुमरूप मलीनता सर्वथा निकल चुकी थी - तथा समस्त शुभानुभावरूप निर्मलता पूर्णरूप से वह चुकी थी । अथवा जिस प्रकार कमल पंकसे उत्पन्न होता है और जल से ता है फिर भी वह इन दोनों से असंवन्धित होता हुआ बिलकुल निर्विवनकर सदा जल के ही ऊपर रहता है तथा अपने अनुपमगुणगण के चल से सुर, असुर एवं नर निकरों द्वारा शिरोधार्य होकर अतिमाननीय गिना जाना है और परमसुख का स्थान माना जाता है, उसी तरह भगवान भी कर्मरूप पंक से उत्पन्न हुए ओर भोगरूप जल से बढ-फिर भी इन से निर्लिप्त होकर वे इनसे दादर ही रहे। और अन्त में केवल ज्ञानादि गुणों के आविर्भाव से वे सकल aorat के शिरोधार्य वन गये । मियायामां माच्या है. भगवान 'उत्तम पुण्डरीक' (श्वेत उभण) वा પુરુષ ટના. કેમકે તેમના આત્મામાંથી સપૂર્ણ અનુભરૂપ માલિન્ય સર્વથા નીકળી ગયું હતું. તેમજ મકલ શુભાનુભાવરૂપ નિર્મળતા સંપૂર્ણરૂપમાં વૃધ્ધિ પામી હતી. અથવા જેમ કેમ કાઢવમાંથી ઉદ્દભવે છે, જછાથી વવ છે, છતા તે આ અન્નથી અસંબંધિત થઈને સર્વથા નિર્લિપ્ત બનીને હંમેશા પાણીની ઉપર જ રહ્યા કરે છે નમર પાનના શ્રેષ્ટ ગુણોના ખાવડ સુર, અસુર અને નર સમૃહાવર્ડ શિરાધા અને બહુજ નમાનીય ગવામા આવે છે, અને અતિ સુખનું સ્થાન મનાય છે, તે જ રીતે ભગવાન પાણુ કર્મરૂપ કાલ્વમાંથી અવતર્યા. અને ભાગરૂપે પાણીથી વૃદ્ધિ પશ્ચા, છના પશ્ન ત અમનાથી નિર્લિપ્ત થઈને અમનાથી હમેશ દર જ રહ્યા ગમન સાન વગેરે અે ોના આવિર્ભાવથી તો બધા ભવ્યજનાના શિરોધાર્ય બન્યા,
SR No.009328
Book TitleGnatadharmkathanga Sutram Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhasilal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1963
Total Pages770
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_gyatadharmkatha
File Size48 MB
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