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________________ भगवतीय अपसस्थवइविणए' अथ का सोऽपशस्तवाग्विनयः ? इति प्रश्ना, भगवानाह'अपसत्यवइविणए सत्ताविहे पन्नत्ते' अपशस्तवाग्विनयः सप्तविधः मज्ञप्तः 'तं जहा वधथा-'पानए' पापा-पापवाकमवर्तनरूपो वाग्विनयः पापकः। 'सावग्जे सावधः सावधवापवर्तनरूपो बाबिनयः सावधः, एवमग्रेऽपि बोध्यः । 'जाव. भूयाभिसंकणे' यावद् भूताभिशङ्कनं यावत्पदेन सक्रियः सोपक्लेशः आश्रयकरः, क्षपिकर एतेषां ग्रहणं भवतीति। 'से अपमत्वाविणए' स एप सप्तमकार: कोऽशस्तवाग्विनयः प्रदर्शितः । 'सेत्तं वा विण' स एप प्रकारद्वयेन वाग्विनयः कथित इति । अथ कायविनयदर्शनायाह-' से कितं कायविणए' अथ का स सात प्रकार का प्रशस्त बचन विनय है। 'से कितं अपसत्यवह चिणए' हे भदन्त ! अप्रशस्त वचन चिनय कितने प्रकार का है ? उत्तर में प्रशुश्री कहते हैं 'अपसत्य बहविणए सत्तविहे पण्णत्ते' हे गौतम! अप्रशस्त वचन विनय लात प्रकार का कहा गया है। 'तं जहा' जैसे'पाधए सादज्जे जाव झूयाभिसंकणे' पापसहित वचन पोलना १ सावध वचन बोलना २ यावत जीवों को भय उत्पन्न हो ऐसे वचन बोलना ऐसे इन वचनों से निवृत्ति करना ये सय अप्रशस्त वचन बिलय है। यहां यावत् शब्द से 'सक्रियः लोपक्लेशा, आश्रवकरः, क्षपिकरः' इन पदों का ग्रहण हुआ है । ‘से तं वइविणए' इस प्रश. स्त वचन विनय और अप्रशस्त चचन विनय के कथन से वचन विनय का कथन पूर्ण हो जाता है । 'खे किं तं कायविणए' हे भदन्त ! काय विनय कितने प्रकार का है ? उत्तर में प्रभुश्री कहते हैं-'फायधिणए पहाना बस थयो छे. 'से तपसत्थवइविणए' मा सात मारना प्रशस्त क्यन विनय ४७ छे. 'से कि त अपसत्यवइविण' 8 अपन् અપ્રશસ્ત વચન વિનય કેટલા પ્રકારને કહેલ છે? આ પ્રશ્નના ઉત્તરમાં प्रभुश्री ४ छ है-'अप प्रत्थवइविणए स्वत्तविहे पण्णत्त', गौतम! मप्रशस्त वयन विनय सात प्रश्न ४ छे. 'त जहा' त मा प्रमाणे छे.'पावए सावज्जे जाव भूयामिसंकणे' ५५२डित क्यन मास १ सावध क्यन બાલવું ૨ યાવત્ છને ભય ઉત્પન્ન થાય તેવા વચન બોલવા આ સઘળો मप्रशस्त पयन विनय ४७स छे. महियां यावत्पथी 'सक्रियः सोक्लेशः, आस्त्रवकरः क्षपिकरः' मा पानी सड थय। छे. 'से तं वइविणए' मा પ્રશસ્ત વચનવિનય અને અપ્રશરત વચન વિનયન કથનથી વચન વિનયનું કથન સમાપ્ત થાય છે. __'से कि त कायविणए' 8 लगवन् यविनय ४८ रन न
SR No.009326
Book TitleBhagwati Sutra Part 16
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhasilal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1972
Total Pages708
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_bhagwati
File Size50 MB
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