SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 561
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ ५३७ प्रमेयचन्द्रिका टीका श० ११४० ११ सू० ६ सुदर्शनचरितनिरूपणम् पुष्फवत्थगंधमल्लालंकारेणं सक्कारेइ, संमाणेइ' तं स्वप्नं सम्यकृतया प्रतीष्यस्वीकृत्य स्वप्नलक्षण पाठकान विपुलेन - प्रचुरेण, अशनपानलादिमस्वादिमपुष्पवत्रनन्धमाल्यालङ्कारेण सत्कारयति, सम्मानयति, 'सकारेत्ता, संमाणेता जीवियारिहं पीइदाणं दलयड़' सत्कार्य, सम्मान्य, विपुलम् - प्रचुरम् जीविकाई - जीविको चित्तम्, प्रीतिदानम् - प्रसन्नता निमित्तकम् उपढौकनं- धनं दापयति, 'दलचित्ता, पडिविसज्जे ' दापयित्वा प्रतिविसर्जयति, पडिक्सिज्जेचा सीहासणाओ अन्ड' प्रतिविसृज्य, सिंहासनात् अभ्युत्तिष्ठति, 'अन्भुट्टेत्ता जेणेव तत्रैव पभावई देवी तेन आगच्छ३' अभ्युत्थाय यत्रैव - प्रभावती देवी आसीत्, उपागच्छति, 'उत्रागच्छिता, पभावई देवि ताहिं इहाहिं काहिं जाव संलवमाणे संयमाणे एवं बयासी' - उपागत्य प्रभावती देवीं ताभिः इष्टाभिः, कान्ताभिः, 5 असणपाण ग्खाइमहाहम पुष्कत्थगंध मल्ललकारेणं सकारेइ संमाणेह ' जय वह स्वप्न को सत्यरूप से अंगीकार कर चुका-तब उसने स्वप्नलक्षण पाठकों का विपुल अशन पान, खादिन, स्वादिम रूप चारों प्रकार के आहार से तथा पुष्प, वस्त्र, गंध, और अलंकारों से सत्कार किया सन्मान किया 'लक्कारेत्ता, संमाणेत्ता, विउलं जीवियारिह पीड़दाणं दल, दलयित्ता परिविसज्जेह, पडिविसज्जेता सीशसणाओ अन्भुट्टे, अभुट्ठेसा जेणेय पभावई देवी, तेणेव उवागच्छन् ' सरकार और सम्मान करके फिर उस ने उन सब के लिये जीविका के योग्य प्रसन्नता निमित्त प्रीतिदान दिलाया प्रीतिदान दिला करके उन सबकी फिर उसने विदा की विदा करके वह सिंहासन से उठा, उठकर प्रभावती के पास आया- ' उवागच्छित्ता पभावह देवि ताहि इद्वाहिं कंताहि जाव संलवमाणे सेलवमाणे एवं दयासी' प्रभावती के पास आकर णपाणखाइमसाइमपुप्फवत्थगधमलालंकारेणं सकारेद्द, संमाणेइ " ફળના સ્વીકાર કરીને તેશે વિપુલ અશન, પાન, ખાદિમ અને સ્વાદિમરૂપ ચારે પ્રકારના આહારથી તથા પુષ્પ, વજ્ર, ગંધ માળા અને અલકારેાથી तेभना सत्कार यो भने तेमनुं सन्मान ययु “सक्कारेत्ता समाणेत्ता, विउ जीविचारिह' पोइदाणं दलयर, दलयित्ता पडिविसज्जे, पडिविसज्जेत्ता सीहासणाओ अब्भुट्ठेइ, अब्भुट्टेत्ता जेणेव पभावई देवी, तेणेव उवागच्छ ” સત્કાર અને સન્માન કરીને તેણે તેમને જીવિકાને લાયક પ્રીતિદાન અપાવ્યુ. તે દાન દ્વારા પેાતાની પ્રસન્નતા વ્યક્ત કરી તેણે તેમને વિદાય કર્યો ત્યાર बाह ते सिंहासन पर भी उठीने प्रभावती देवीनी पासे गये। " वागच्छित्ता पभावई देवि ताहिं इट्ठाहिं, कताहिं जाव संलवमाणे संलवमाणे एवं वयासी " त्या स्वप्न भ० ६८
SR No.009319
Book TitleBhagwati Sutra Part 09
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhasilal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1967
Total Pages770
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_bhagwati
File Size45 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy