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देह उडी कर्पुर समाना, मधुर सुगन्धी फैला नाना। फैलाई रत्नों को माला, चारों दिशा चमके उजियाला। कहै ‘सुमत' क्या गुण जिन राई, तुम पर्वत हो मैं हूँ राई । जब ही भक्ती भाव हुआ है, चम्पापुर का ध्यान किया हैं। लगी आश मै भी कभी जाऊँ, वासु पूज्य के दर्शन पाऊँ।
सोरठा
खेये धूप सुगन्ध, वासु पूज्य प्रभु ध्यान के।
कर्म भार सब तार, रूप स्वरूप निहार के। मति जो मन में होय, रहें वैसी हो गति आय के। करो सुमत रसपान, सरल निज्जात्तम पाय के ।
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