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राज-पाट सुख सम्पदा,
बाजि वृषभ गजराज। मणि, माणक मोती महल,
प्रेमी स्वजन समाज।। आया क्या तेरे साथ में,
जायेगा क्या तेरे साथ। जीव अकेला जायेगा,
बंधु पसारे हाथ ।। दुर्लभ मानव भव मिला,
कर एकत्व विचार। कैसे होगा अन्यथा,
तुझ आतम उद्धार।।
सुत दारा और लक्ष्मी, पापी को भी होय। संत समागम हरि कथा, तुलसी दुर्लभ दोय ॥
पुण्य क्षीण जब होत है, उदय होत है पाप।
दाझे वन की लाकड़ी, प्रज्वले आपो आप।।
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