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(२९)
कर्म कलंक धनादिनुं, तेहथकी ऊट धूजेरे ॥ सत्य शौच ॥ १॥ सत्य ग्रात्म स्वरूपनी, श्रा मनमां कीजैरे; नपनीतादिक भेदने, जाली स त्य वदीजेरे || सत्य ॥ २ ॥ कुरुकपट त्यागी करी, आप स्वावे रही एरे; त्याग करी परजावनो, शिवसुख सेहेजे लदीएरे || सत्य० ॥ ३ ॥ मन व्यापार निवृत्तिश्री, शान्ति चेतन पामेरे: श्रात्म अनुभव जागतां, कर्म रोग ऊट वामेरे ॥ सत्य ॥ ४ ॥ परपुद्गल संयोगथी, चेतन चनगति जटकेरे; तेहतला त्यागे करी, जमतो चेतन अटकेरे ॥ सत्य० ॥ ५ ॥ स्वगुणे करी स त्य बे, आत्मराय नवि जाणोरे; बुद्धिसागर सु खली, होवे शिवपुर राणोरे ॥ सत्य० ॥ ६ ॥ हूँ। श्री परम पुरुषाय कुसुमयजामहे स्वादा.
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