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(२६)
सुगंधे जिन पूजता, सुवासीत मन प्राण.
( सुण बहनी पियुमा पग्दंशी.-ए देशी. )
चंदनप्पूजा करते शुननावे, जिनवरनी सुख काजेरे; चंदन सम चेतन शीतलता, थातां शिव सुख गजेरे ॥ चंदन ॥१॥ केसर चंदन घसी जयणाये,मांहे घनसार मिलावोरे; रजत कचोली मांहे ठवीने, प्रभुपूजा विरचावोरे॥चंदन०॥॥ चंदनपूजा योगे जयसुर, शुनमति शिवसुख पामेरे; तिम नवियरा चंदनाजायी, जाये अविचल गमेरे ॥ चंदन ॥३॥
(वीर जिनेश्वर नपदिशे.-ए देशी.) चंदन समकित जावधी,पूजन चेतन कीजे रे; मिथ्यामल दूरे करी,अविचल पदवी लीजेरे. चंदन ॥१॥ दोष अढार रहित प्रभु, देवतत्त्व मन प्राणोरे;सुसाधु गुरुतत्त्व, व्य क्षेत्र काल जा गोरे॥चंदनाशाजिनवर नाषीत सत्य ,धर्म
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