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निज्जियदप्पुद्ध ररिउनरिंदनिवहा भडा जसं धवलं । पावंति पावपसमिण ! पासजिण ! तुह प्पभावेण ।१७।
युग्मं रोगजलजलणविसहरचोरारिमइंदगयरणभयाई पासजिणनामसंकित्तणेण पसमंति सव्वाइं ॥१८॥ एवं महाभयहरं पासजिणिंदस्स संथवमुआरं । भवियजणाणंदयरं कल्लाणपरंपरनिहाणं ॥१९।। रायभय-जक्ख-रक्खस-कुसुमिण-दुसुमिण-रिक्खपीडासु । संझासु दोसु पंथे उवसग्गे तह य रयणीसु ।।२०।। जो पढइ जो अ निसुणइ ताणं कइणो य माणतुंगस्स । पासो पावं पसमेउ सयलभुवणच्चिअच्चलणो ।२१॥ उवसग्गंते कमठा-सुरम्मि झाणाओ जो न संचलिओ। सुर-नर-किन्नरजुवईहिं संथुओ जयउ पासजिणो ।२२। एअस्स मज्झयारे अट्ठारसअक्खरेहिं जो मंतो । जो जाणइ सो झायइ परमपयत्थं फुडं पासं ।।२३।। पासह समरण जो कुणइ संतुठे हियएण । अछुत्तरसय वाहिभय, नासेइ तस्स दुरेण ॥२४।।
आज पढ़ना सब जानते हैं पर क्यों पढना चाहिये यह कोई नहि जानता ।
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