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________________ ३० 1 नंबर.. 1 1 I साधुभाद्ध प्रतिकमणचैत्य गुरुवंदन अवचूरि साधु प्रतिक्रमण वृत्ति t "" श्रावक प्रतिक्रमण सूत्र गा. ५२ ܕ " 20 59 नाम. चूर्णि वृति जैनागम लिए, लघुवृत्ति वृति i लोक. ८०० २९६ ५४८ ६७२ १९५० २०० १७७ कतो. तिलकाचार्य जिनप्रभ पार्श्वदेव • विजयसिंह : श्रीचंद्र तिलकाचार्य पार्श्वग रचयानो संवत्. ६३६४ ११८३ १२२२ ● पार्श्वदेवगण सं. ११३१ थी. १९९० सूमी इता एवा पुत्रा मले के. एम. सं.! खती पाटणनी टीपमो एवं नौधायूँ के के यक्षदेवना शिष्य पार्श्वदेवे सं. ९५६ मां आ वृत्ति करी छे, सुनवृत्तिनो ज एक भाग होवो जोइए एम वधु संभवे छे. एने मंदितसूत्र पण कहे छे. भा विजयसिंह ते पोपलिया गच्छना शांतिसूरिना शिष्य छे. f आवृत्ति ते पार्श्वरिनो प्रथम नोंघायली वे हजार लोकवाली वृत्तिनौ ककको छे
SR No.008418
Book TitleJain Granthavali
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJain Shwetambar Conference
PublisherJain Shwetambar Conference Mumbai
Publication Year
Total Pages504
LanguageGujarati
ClassificationBook_Gujarati & Catalogue
File Size7 MB
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