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________________ २७८ जैन औपदेशिक नंबर. नाम. नाम श्लोक. कर्ता. रच्या नो सं.] क्यां छ? ५७५, मुनिसुंदर नरचंद्र सागरचंद्र पा. ३-५ पा. ३-५ पिटर्सन रि.५ A.S A.S. नगीनदास. विलमविजय भूपाल तथा पद्मनंदि चतुर्विंशतिजिनस्तोत्र अवचूरि चतुर्विंशतिजिनस्तोत्र " (गुप्तक्रिय) A वृत्ति . चतुर्विंशतिजिनस्तोत्र चतुर्विशतिकास्तोत्र चतुःषष्ठियोगिनीस्तुति चित्रस्तोत्र __वृत्ति ३७ चित्रस्तोत्र (बीजु) वृत्ति चित्रषद्धपार्श्वस्तोत्र चिंतामाणे चिंतामण्यटक जनेनयेनस्तुति वृत्ति देवसुंदर शिष्य | साधुराज प्रो.मणिलाल. A जेसलमेरनी टीपमा हीरालाले क्रियागुप्त एवा अचोकस नामथी जेनी नोध करी छे अने तेज नामयी आ वर्गनी शरुआतमा जेने अमे नाध्युं छे तेज आ स्तोत्र नहि होय? ते बाबतनी खरी खात्री जेसल|मेरना भंडारमांनी प्रत फरीथी तपासवाथी यई शके.
SR No.008418
Book TitleJain Granthavali
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJain Shwetambar Conference
PublisherJain Shwetambar Conference Mumbai
Publication Year
Total Pages504
LanguageGujarati
ClassificationBook_Gujarati & Catalogue
File Size7 MB
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