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________________ जैन औषदेशिक नाम. श्लोक. । कर्ता. क्यां छ? प्रत्येकबुद्धकथा १९९ १४०० पत्र २६ पत्र १३/ १७१६॥ ८९ प्रभावतीकथा प्रियंकरकथा बलभद्रकथा बलिनरेंद्रकथा ब्रह्मदत्ताकथा (प्रा.) ब्रह्मदत्तादिकथा भद्रबाहुकथा भरटकद्वात्रिंशिकाकथा भरतनटादिकथाओ भरतेश्वरबाहुबलिवृत्ति. भविष्यदत्ताख्यान A मत्स्योदरकथा मदनापलिकथा मदनरेखाकथा (गद्य) मंगलकलशकथा १०२८२ शुभशील | २००० महेंद्ररि असल.ली.नगीनदास पत्र ५ पत्र १९ अ.२ पत्र २६ पा. ३, अ.१ A आ कथा पंचमीमाहात्म्य उपर रचेली छे ते पूर्व चरित्रना वर्गमा नौधाई छे, छतां कथाना नामथी विशेष ओळखाती होवाथी इहांपण नोंधी छे. जेसलमेरनी हीरालाले करेली पोतानी टीपमा तथा लींचंडीनी टीपमां एना की महेश्वरसूरि लख्या छे, खंबातना शेठ नगीनदासना भंडारमा महेंद्रसरि नाम आपीने सदरहू प्रत लख्यानो संवत् १२१४ नोधैलो छे. हालमां पं. श्री आणंदसागरजी जणावे छे के आ शिवाय बीजी एक धनपालकृत पण छे पण ते अमोने उपलब्ध थई नथी.
SR No.008418
Book TitleJain Granthavali
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJain Shwetambar Conference
PublisherJain Shwetambar Conference Mumbai
Publication Year
Total Pages504
LanguageGujarati
ClassificationBook_Gujarati & Catalogue
File Size7 MB
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