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________________ श्री दशवकालिकसूत्रे संचारेण साधोस्तन्निमित्तकः संयमापचारः, विहारभूमावविहारभूमौ च संचरणस्य शास्त्राऽऽज्ञापितत्वादिति भावः।। 'सव्वभावेण' इति पदेन सर्वथा सर्वजीवसंरक्षणमन्तरेण चारित्राराधना न भवितुमर्हतीति, 'अप्पमत्तो' इत्यनेन प्रमादवान सम्यक् सूक्ष्मजीवनिकायरक्षणं कर्तुं न क्षमते इति मुच्यते, 'सञ्चिदिअसमाहिए' इत्यनेन रागद्वेषपरित्यागेनैव यतना संभवतीति व्यज्यते ॥१६॥ मूलम्--धुवं च पडिलेहिजा, जोगेसा पायकम्बलं! सिजमुच्चारभूमि च, संथारं अंदुवासणं ॥१७॥ छाया-ध्रुवं च प्रतिलेखयेत् योगेन पात्रकम्बलम् । शय्यामुच्चारभूमिं च संस्तारकमथवाऽऽसनम् ॥१७॥ टीका-'धुवं' इत्यादि। साधुः पात्रकम्बलं-पात्रं च कम्बलं चेति समाहारद्वन्द्वः, पात्रं काष्ठादिमयं, कम्बलम् ऊर्णातन्तुमयं, शय्यां-बसतिम् आवासभूमिमित्यर्थः उच्चारभूमि= आदि से संयम में तत्प्रयुक्त (सूक्ष्म स्नेहकाय के निमित्त से) किसी प्रकार का दोष लगता है क्योंकि, विहार भूमि आदि में विचरने की साधु को शास्त्र में भगवानने आज्ञा दी है । जीवो की सर्वथा रक्षा किये विना चारित्र की आराधना नहीं हो सकती यह “सव्व भवेण" पदसे प्रगट किया है। प्रमादी सूक्ष्मकाय भली भांति रक्षा नहीं कर सकता यह " अप्पमत्त" पदसे सूचित किया है। "सव्विंदियसमाहिए" पदसे यह व्यक्त किया गया है कि रागद्वेष का त्याग करने से ही यतना का पालन हो सकता है ॥१६॥ ___ 'धुवंच' इत्यादी । साधु काष्ट आदि के पात्र का, निवास भूमि का, उच्चार प्रस्रवण भूमिका, शयनोयोगी तृण आदि के बने हुए કઈ પ્રકારનો દેષ લાગતું નથી, કારણ કે વિહાર ભૂમિમાં વિચારવાની સાધુને શાસ્ત્રમાં ભગવાને આજ્ઞા આપી છે જેની સર્વથા રક્ષા કર્યા વિના ચારિત્રની આરાધના થઈ थती नथी, ये सव्वभावेण पहथी घट यु छ, प्रभाही साधु सूक्ष्म अयनी रक्षा સારી રીતે કરી શકતા નથી એ મુખ્યમંત્ત શબ્દથી સૂચિત કર્યું છે सव्विंदियसमाहिए पथी मेम व्यरत ४२वामi मायुं छे : सपना त्याग ४२वाथी यतनानु पासन ४ २ छे. (१६) धुवंच. त्या6ि. Uष्ट मान पात्रनु, निवास मूभिनु, न्यार पानी ભૂમિનું, શયને પગી તૃણ આદિના બનેલા સંસ્મારકનું, પીઠ, ફલક આદિ આસનનું શ્રી દશવૈકાલિક સૂત્રઃ ૨
SR No.006368
Book TitleAgam 29 Mool 02 Dasvaikalik Sutra Part 02 Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhasilal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1960
Total Pages287
LanguageSanskrit, Hindi, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & agam_dashvaikalik
File Size15 MB
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