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________________ प्रमेयद्योतिका टीका प्र.५ सू.१३० सूक्ष्माणां कायस्थित्यादिनिरूपणम् ११९५ खलु भदन्त ! कियन्तं कालमन्तरं भवति ? 'गोयमा ! जहन्नेणं अंतोमुहुत्तं-उक्कोसेणं असंखेज्जं कालं' भगवानाह-गौतम ! अन्तर्मुहूर्त जघन्येनाऽसंख्येयकालमुत्कर्षण । 'कालओ असंखेज्जाओ उस्सप्पिणी ओसप्पिणीओ' कालतोऽसंख्याताउत्सर्पिण्यवसर्पिण्यः कालत एषा मार्गणा-'खेत्तओ अंगुलस्स असंखेज्जइभागो' क्षेत्रतोऽङ्गुलस्याऽसंख्येयो भागः (अङ्गुलमात्रक्षेत्रस्याऽसंख्येयतमे भागे ये आकाशप्रदेशाः ते प्रतिसमयमेकैकप्रदेशापहारे यावतीभिरुत्सर्पिण्यवसर्पिणीभिनिर्लेपा भवन्ति तावत्य उत्सर्पिण्यवसर्पिण्यः) एवं पृथिवीकायिकस्य सूक्ष्म पृथिभदन्त ! सूक्ष्म जीव का अन्तर कितने काल का कहा गया है ? अर्थात् सूक्ष्म अवस्था को छोडकर पुनः सूक्ष्म अवस्था प्राप्त करने में अन्तर कितने काल का होता है ? इसके उत्तर में प्रभु कहते हैं-'गोयमा ! जहण्णेणं अंतोमुहुत्तं उक्कोसेणं असंखेज्जं कालं' हे गौतम ! जघन्य से अन्तर एक अन्तर्मुहूर्त का होता है और उत्कृष्ट से अन्तर असंख्यात काल का होता है इस असंख्यात काल में 'असंखेज्जाओ उस्सप्पिणीओ सप्पिणीओ खेत्तओ अंगुलस्स असंखेज्जइभागो' असंख्यात उत्सर्पिणीयां और असंख्यात अवसर्पिणियाँ आ जाती है तथा क्षेत्र की अपेक्षा अगुलमात्र क्षेत्र के असंख्यातवें भाग में जितने आकाश प्रदेश है उनमें से एक एक समय में एक २ प्रदेश का अपहार करने पर जितने काल में वे प्रदेश सबके सब उस में से निकल जाते है-अर्थात् वह स्थान उन प्रदेशों से सर्वथा शून्य बन जाता है, तो ऐसा करने में जितनी उत्सर्पिणीयां और अवसर्पिणियां समाप्त हो અંતરકાળનું કથન 'सुहमस्स णं भंते ! केवतियं कालं अंतर होई' है भान् सूक्ष्म अपने અંતરકાળ કેટલા કાળને કહેવામાં આવેલ છે? આ અર્થાત્ સૂક્ષ્મ અવસ્થાને છેડીને ફરીથી સૂમ અવસ્થા પ્રાપ્ત કરવામાં કેટલા કાળનું અંતર હોય છે ? या प्रश्न उत्तरमा प्रसुश्री ॐ ॐ ॐ-गोयमा ! जहण्णेणं अंतोमुहुत्तं उक्कोसेणं असंखेज्जं कालं' गौतम! धन्यथी ४ मतभुतनु तर साय छे. અને ઉત્કૃષ્ટથી અસંખ્યાત કાળનું અંતર હોય છે. આ અસંખ્યાત કાળમાં 'असंखेज्जाओ उस्सप्पिणीओसप्पिणीओ खेत्तओ अंगुलरस असंखेज्जइभागो' અસંખ્યાત ઉત્સપિણી અને અસંખ્યાત અવસર્પિણી આવી જાય છે. તથા ક્ષેત્રની અપેક્ષાથી આગળ માત્ર ક્ષેત્રના અસંખ્યાતમાં જેટલા આકાશ પ્રદેશ છે તેમાંથી એક એક સમયમાં એક એક પ્રદેશને અપહાર કરવાથી–બહાર કહાડવાથી જેટલા કાળમાં તે બધાજ પ્રદેશે તેમાંથી નીકળી જાય અર્થાત્ એ જીવાભિગમસૂત્ર
SR No.006345
Book TitleAgam 14 Upang 03 Jivabhigam Sutra Part 03 Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhasilal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1974
Total Pages1580
LanguageSanskrit, Hindi, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & agam_jivajivabhigam
File Size84 MB
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