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________________ अनगारधर्मामृतवर्षिणीटीकासू. १३ अकालमेघदोहदनिरूपणम् १८९ णाई' नो परिजानाति, एताः काः सन्ति मत्पुरतः इत्यपि नावबुध्यते, अनाद्रियमाणा-तासामादरमकुर्वाणा, अपरिजनाना तदुपस्थिति मनवबुध्यमाना तूष्णोका संतिष्ठते मौनमवलम्ब्य निष्ठतिस्म। ततः खलु ताः अङ्गपरिचारिका आभ्य तरिकादासचेटयः धारिणी देवी 'दोच्चंपि तच्चंपि' द्वितीयवारमपि तृतीयवारमपि, एवमवादिषुः, 'किन्न' किंखलु-किमर्थ हे देवानुप्रिये ! त्वम् अवरुग्णा अवरुग्णशरीरा यावद ध्यायसि-आर्तध्यानं करोषि । ततःखलु सा ताभिरङ्गपरिचारिकाभिः आभ्यन्तरिकाभिः दासचेटिकाभिर्द्वितीयवारमपि तृतीयवारमपि इस तरह उन आभ्यन्तरिक अंगपरिचारिकाओं एवं दासचेटियों द्वारा पूछी जाने परभी उस धारिणी देवी ने प्रत्युत्तर देकर उनका कुछ भी आदर नहीं किया और न उसे यह भी भान रहा कि ये मेरे समक्ष कौन खडो२ बोलरही है। इस प्रकार (अणाढायमाणी अपरियाणमाणी तुसिणीया संचिदृइ) उनका अनादर करती हुई और उनकी उपस्थिति को नहीं जानती हुई वह धारिणी देवी उस समय केवल चुप ही रही। (तएणं ताओअंगपरियास्यिाओ अभितरियाओ दासचेडियाओ धारिणी देवीं दोच्चपि तच्चपि एवं क्यासी किन्नं तुमे देवाणुप्पिए ओलुग्गा ओलुग्गसरीरा झियायसि ?) धारिणी देवी को इस तरह जब उन्होंने मौनाश्रित देखा तो पुनः अभ्यन्तरिक परिचारिकाओने तथा दास चेटिकाओंने उस धारिणीदेवी से दुवारा और तिबारा भी ऐसा ही कहा हे देवानुप्रिये ? तुम कृश शरीर होकर क्यों आर्तध्यान में मग्न बनी हुई बैठी रहती हो? तुम्हें क्या चिन्ता है कहो (तएणं साधारिणी देवा ताहि अंगपडियारियाहिं अभितरियाहिं दासचेडियाहि दोच्चंपि तच्चपि एवं वुत्ता समाणी णो अढाइ णो પૂછ્યું પણ ધારિણી દેવીએ જવાબ આપીને તેઓને આવકાર આપે નહિ તેને આટલી પણ સુધબુધ રહી નહિ કે અમારી સામે કોણ ઉભું છે અને મને કંઈક પૂછી રહ્યું छ. २॥ शते (अणाढायमाणी अपरियाणमाणी तुसिणीया संचिट्ठइ) तेमाने જરાપણ આવકાર આપ્યા વગર અને તેઓની ઉપસ્થિતિને પણ નહિ જાણતી ધારિણીवाते समये मौन । सेवती २डी. (तएणं ताओ अंगपरिचारियाओ अम्भितरिया ओधारिणीदेवों दोच्चंपि तच्चपि एवंवयासी किन्नं तुमे देवाणुप्पिए ओलु. गगा ओलुग्गसरीरा झियायसि ?) २ प्रमाणे पारिवाने भौन 8ने २६पासनी પરિચારિકાઓ અને દાસચેટિકાઓએ ફરી બે વાર ત્રણવાર એમ જ કહ્યું કે હે દેવાનું પ્રિયે! દુર્બળ થયેલા તમે ચિંતામગ્ન શા માટે રહો છો? તમને શું ચિન્તા છે? मभने ४.. [नएणं सा धारिणीदेवी ताहिं अंगपडियारियाहिं अम्भिंतरियाहिं શ્રી જ્ઞાતાધર્મ કથાંગ સૂત્રઃ ૦૧
SR No.006332
Book TitleAgam 06 Ang 06 Gnatadharma Sutra Part 01 Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhasilal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1963
Total Pages764
LanguageSanskrit, Hindi, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & agam_gyatadharmkatha
File Size45 MB
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