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________________ आगम (०१) “आचार" - अंगसूत्र-१ (नियुक्ति:+चूर्णि:) श्रुतस्कंध [१], अध्ययन [१], उद्देशक [५], नियुक्ति: [१२६-१५१], [वृत्ति-अनुसार सूत्रांक ३९-४७] प्रत वृत्यंक [३९ ४७ | तिसादी ण तिवेदेति, दरिसणगुणो कुतिस्थिरसुण मुमति सुलसा वा जहा, चरितगुणो ण चिसएसु राग करेइ, दोसं वा, धूल- वनस्पतिः श्रीश्राचा- संग सूत्र मद्दो जहा, आवडो चउबिहो णामादी, दच्चे साभिनकरणअधिगरणएगतपुहूत्तेमु जहासंभवं भाजीयब्ध, दवस आवदृणादिसु चूर्णिः | कईचि उदगस्स आवट्टो भवति, दवाणं आगासे कोचपंतीमादीणं पुणो पुणो आवद्दो भवति, दवेण तेणेव उदगेण तणादि आवट्टिता, दग्वेहिं संदामगकचियादीहि लोहादि, सणिहाणेवि एगत्तपुहुने विभासा, भावाबट्टो गाम अण्णाणभावसंकंती उदइयभावोदयो वा, गरगादिमु भावेसु आवद्दति, आह-जे गुणे से आवडे, आम, जे आवहे से गुणे, आम, गतिपञ्चागति-) लक्खणं, कोऽभिप्पायो, कायपुग्गलुत्था (कोइलमुरचुत्थ) सद्दादिणा रागो तप्पडिपक्खे दोसो, ततो संसारियं कम्म भवतीति-11 | काउं कारणे कार्योपचारा भण्णति जो एवं गुणो सो आवट्टो, आवट्टो कहं गुणो भवति?, गुणतो अण्णऽण्णो आवट्ठो तेण आवट्टो | अ गुणो, जब नाणनाणीणं एगत्त, अहवा जो गुणेसु बट्टति सो आबट्टे वह ?, आम, गतिपच्चागतिलक्खणं, कोभिपायो ?, गुणेसु वट्टमाणो ण संसारा उबट्टति, एते गुणा कत्थ', भण्णाति-पण्णवगदिसं पडुच उई पासातातिइम्मियेस, अध अहे, उच्च-| स्थांगारित्थले वा आरुढो, तिरिय आवासगं, अहवा उडुलोए वेमाणियादि अहे भवणवासीणं तिरियं दीवसमुद्रव्यन्तरजोइसि-1 याण य मणुयस्स तिरिक्खाणं सभाप्रपादिसु, पाईणग्रहणेण तिरिय चत्तारि दिसाओ अणुदिसाओ य गहियाओ, पासिस्सामिति IAW दरिसणिजाई, ताणिमणुवत्तणेण सयमिव अप्पाणं दरिसेति, असोभणेहिं तु आमणेदिवि दिट्ठी णिवत्तेति, अहवा पासियाई ताहि | |चकखुफासियाई जहण्योण अंगुलस्स संखेअइभागे उक्कोसेणं सातिरेगाओ जोयणसयसहस्साओ, पदिइय-पस्समाणो रूबाइं। |पासह जं भणितं स चक्खुजोओ उपउत्तो पासइ, भणितं साहियं तं सुणाति, एवं 'महावि सुणिमाणि सुणेति' सुणिमाइंति- ॥३३॥ दीप अनुक्रम ४०४८] मुनि दीपरत्नसागरेण संकलिता......आगमसूत्र-[०१], अंग सूत्र-[१] "आचार" जिनदासगणि विहिता चूर्णि: [37]
SR No.006201
Book TitleAagam 01 ACHAR Choorni
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherDeepratnasagar
Publication Year2017
Total Pages388
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size30 MB
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