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________________ अनु०—अनुयोगद्वार आ० - आचारांग आ० चू० - आचाराङ्ग चूला आव- आवश्यक आ० नि०-आवश्यक निर्युक्ति इसि० - इसिभासियम् उ०- उत्तराध्ययन औ० औपपातिक कुन्द० अ० - कुन्दकुन्द द्वादशानुप्रेक्षा गो० जी० गोम्मट्टसार जीव-कांड द० - दशवैकालिक द० पा०—दर्शनपाहुड दश भ० - दशभक्ति दशा० ० - दशाश्रुतस्कन्ध द्रव्य सं० - द्रव्य-संग्रह द्वा० अ० } संकेत-सूची द्वा० अनु० ध० - धवला (षट्खंडागम) नि० चू० - निशीथ चूर्णि नि० सा० - नियमसार पंच० प्र० - पंच प्रतिक्रमण पंच० सं० - पंचसंग्रह - द्वादशानुप्रेक्षा (कार्तिकेय) पंचा० - पंचास्तिकाय प्रव० } प्र० सा० बो० पा०—बोधपाहुड भ० आ० } भगवई - भगवती भग० आ० -प्रवचनसार मू० मू० आ० -भगवती आराधना भा०पा०—भावपाहुड भक्त० परि० - भक्त - परिज्ञा महा० नि० - महानिशीथ } - मूलाचार (वट्टकेर) मूल० - मूलाचार ( कुन्दकुन्द ) मो० पा० - मोक्षपाहुड २० सा - रयणसार वि० आव० भा०-विशेष आवश्यक भाष्य शी० पा० ० - शीलपाहुड स० सा० - समयसार स०सु० - समणसुत्त सू० - सूत्रकृतांग सू० पा० - सूत्रपाहुड
SR No.006166
Book TitleMahavir Vani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShreechand Rampuriya
PublisherJain Vishva Bharati
Publication Year1997
Total Pages410
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size23 MB
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